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छोड़ आए गाँव में वो, ज़िंदगानी याद है।

सौंपकर पुरखे गए जो, वो निशानी याद है।

 

गाँव था सारा हमारा, ज्यों गुलों का इक चमन,

शीत, गर्मी, बारिशों की, ऋतु सुहानी याद है।

 

एक हो खाना खिलाना, रूठ जाने की अदा,

फिर मनाने मानने की, वो कहानी याद है।

 

छुप-छुपाते, खिलखिलाते, हँस हँसाते रात दिन,

फूल, बगिया, बेल-चम्पा, रात रानी याद है।

 

मुँह अँधेरे, त्याग बिस्तर, भागना भूले कहाँ?

हाथ में माँ से मिली, गुड़ और धानी याद है।

 

ज्ञान गुण के बोध का, कितना सुखद अहसास वो,

जो बुजुर्गों ने हमें दी, सीख वानी याद है।

 

आ गया उस गाँव में, झोंका अचानक लोभ का,

जब शहर ने छीन ली, हमसे जवानी याद है।

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

कल्पना रामानी

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Comment

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Comment by Anurag Singh "rishi" on June 1, 2013 at 7:07pm

वाह बेहद सुन्दर गजल हेतु बधाई

आ गया उस गाँव में, झोंका अचानक लोभ का,

जब शहर ने छीन ली, हमसे जवानी याद है।

Comment by कल्पना रामानी on May 3, 2013 at 6:50pm

आदरणीय प्रदीप जी, रचना तक आने और सराहने के लिए  हार्दिक आभार

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 3, 2013 at 4:49pm

छोड़ आये हम वो गलियां 

वाह याद दिला दी 

बधाई 

आदरणीया सादर 

Comment by कल्पना रामानी on April 25, 2013 at 10:08pm

आदरणीय वीनस केसरी जी, हार्दिक आभार....

Comment by वीनस केसरी on April 24, 2013 at 11:58pm

बहुत खूब

Comment by कल्पना रामानी on April 24, 2013 at 7:06pm

आदरणीय सौरभ जी, आपकी टिप्पणी से हार्दिक प्रसन्नता हुई, बहुत बहुत धन्यवाद आपका...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 24, 2013 at 6:57pm

गाँव की यादों के गिर्द अच्छी मुसलसल ग़ज़ल हुई आदरणीया कल्पना रमानी जी.  हर शेर में माज़ी उपट कर बाहर आता है. बहुत ही अच्छा प्रयास हुआ है. एक बहुत भली ग़ज़ल के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

Comment by कल्पना रामानी on April 24, 2013 at 1:22pm

आदरणीय अरुण जी, साराहना के लिए हृदय से आभार...

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 24, 2013 at 11:27am

आदरणीया कल्पना जी सादर वाह शानदार अशआरों से सुन्दर खूबसूरत ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें. खास कर इन अशआरों के लिए कुछ ज्यादा ही दाद कुबूल फरमाएं.

छुप-छुपाते, खिलखिलाते, हँस हँसाते रात दिन,

फूल, बगिया, बेल-चम्पा, रात रानी याद है।

आ गया उस गाँव में, झोंका अचानक लोभ का,

जब शहर ने छीन ली, हमसे जवानी याद है।

Comment by कल्पना रामानी on April 24, 2013 at 9:52am

आदरणीय अशोक जी, रचना को अपना स्नेह प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार...

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