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पूरा दिन यूँ ही गुज़ारा था निर्जला तुमने

हंसके डिब्बे में रखी थी परमल... फेवरेट थी मेरी...

मैंने ऑफिस में उड़ाई थी पराठों के संग

तुमने एक दिन में ही जन्मों का सूखा काटा था...

औंधी दोपहरी कहीं टांग दी थी खूँटी से...

और फिर रात को पीले मकान की छत पर...

चाँद दो घंटे लेट था शायद...

चांदनी छानकर पिलाई थी...

पूरा दिन,यूँ ही गुज़ारा था निर्जला तुमने

आज भी रक्खा है...वो दिन मेरे सिरहाने कहीं...

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Comment by Sudhir Sharma on October 29, 2010 at 9:19pm
धन्यवाद बागी जी
Comment by Sudhir Sharma on October 29, 2010 at 9:18pm
धन्यवाद नवीन जी

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 29, 2010 at 8:40am
सुधीर शर्मा जी, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार मे स्वागत है आपका और आपकी मौलिक रचनाओं का, एक अच्छी रचना प्रस्तुत किया है आपने, उम्मीद करते है कि आगे भी आप कि मौलिक रचनाये हम सब को पढ़ने को मिलेगी |
धन्यवाद |
Comment by Sudhir Sharma on October 29, 2010 at 7:41am
धन्यवाद विवेक जी..
Comment by विवेक मिश्र on October 29, 2010 at 12:48am
OBO परिवार में आगमन की हार्दिक बधाई.

"आज भी रक्खा है...वो दिन मेरे सिरहाने कहीं.."
पहली रचना ही 'गुलज़ार-भाव' से ओतप्रोत है. बढ़िया प्रस्तुति. हार्दिक शुभकामनाएँ..

कृपया ध्यान दे...

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