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शोर कैसा भी हो, मेरे दिल को, अब भाता नहीं |
चहचहाना भी परिंदों का, सुना जाता नहीं ||
दावा करते थे, मेरा होने का,पहले जो कभी | 
नाम मेंरा उनके लब पर, आज-कल आता नहीं ||
हूँ चमन में,आज भी, पर दिल में, जंगल आ बसा |

अब तो आफत क्या, क्यामत से भी, घबराता नहीं ||
आँख करके बंद, चलने में हूँ, माहिर हो गया |
स्याह रातों में भी, दीवारों से, टकराता नहीं ||
क्यूँ 'शशि तू ज़िन्दगी से, हो गया बेज़ार है |
बिन मुकद्दर, वक़्त से, पहले कोई पाता नहीं ||

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Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on October 5, 2012 at 11:28pm

संवेदनाओं से ओतप्रोत कृतित्व पर हार्दिक बधाई

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