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तुमसे हारा ( एक पाती उसके नाम)

याद है तुम्‍हें वे ढाक के पेड़
जहां ऐसे ही सावन में
हम-तुम भींगे थे.....
और....कितना रोया था मैं
कि पहली छुअन की सिहरन
को पचा नहीं पाया ...

उस विशाल मैंदान की मांग.....
जब मेरे साइकिल पर
तुम बैठी थी और

उसकी हैंडल मुड़ गई थी
क्‍योंकि मेरा ध्‍यान तो.....

अक्‍सर वहां जाता हूं
तुम्‍हें ढूंढने
और लौटकर फिर सारी रात
आंसुओं को गटकता रहता
मेरा एक अपराध.....

किस तरह तड़पी होगी
तुम्‍हारी वो बेबश रात
जब मेरे इनकार को
सुनकर थम नहीं पाया
तुम्‍हारे हृदय का लहू
और हाहाकार करता
निकल पड़ा जख्‍म का
बहाना करके...........

अब भी वे कटी कलाइयां
घेर लेती हैं मुझे
ये कहते हुए कि
मेरे कंगन देख लो...........
बस एक इनकार
यह मेरा अपराध
हो सके तो कभी
माफ कर देना
 
तुम्‍हें ना कहना
तुम्‍हारे ही वैभव ने
मुझे सिखाया
तुम्‍हारी खूबसूरती
मेरा खिलौना नहीं थी
कि तुम्‍हारे जाने के बाद........
ना बरसात हुई.........
ना मेघ आए.......

मेरी वो बेधड़क हंसी
जिससे तुम विवश थीं
वो चटक गई.........
तुम्‍हारी मुहर का रंग.....
निकलता ही नहीं
 
रूप की तारीफ़
कर देता हूं
किंतु् पीने की कोशिश करते ही......
लगता है अम्‍ल.......
हलक में दौड़ गया

तुम्‍हारी गुलाबी बातें
मेरे अंधेरे में
बेलौस आती बातें.........
'हमेशा तुम्‍हारा' तो
नहीं लिख सकता
लेकिन 'तुमसे हारा'
लिख ही सकता हूं
केवल,
तुमसे हारा .........................................

Views: 270

Comment

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Comment by PHOOL SINGH on August 28, 2012 at 12:21pm

राजेश जी नमस्कार

बहुत ही सुंदर शब्दों का मिश्रण ....सुंदर रचना के लिए बधाई

फूल सिंह

Comment by Yogi Saraswat on August 27, 2012 at 10:49am

तुम्‍हें ना कहना
तुम्‍हारे ही वैभव ने
मुझे सिखाया
तुम्‍हारी खूबसूरती
मेरा खिलौना नहीं थी
कि तुम्‍हारे जाने के बाद........
ना बरसात हुई......... ना मेघ आए.......

झा साब , बहुत ही बढ़िया शब्द ! आपने पुराने दिनों की याद दिला दी ! बहुत बढ़िया , खूबसूरत शब्दों में लिखी रचना

कृपया ध्यान दे...

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