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है मुझे अपने वतन पर बड़ा ही नाज़ 

 जहाँ हर कदम पर है एक नया साज़ 
कहीं खुशियाँ तो कहीं गम की आवाज़ 
कहीं उल्लास तो कहीं उदास 
कहीं मिठास तो कहीं खटास
कहीं कल की चिंता तो कहीं गीत गुनगुनाता आज 
कहीं उगता हुआ सूरज तो कहीं डूबता हुआ जहाज़ 
कहीं दूर तक फैली हरियाली तो कहीं धरती बाँझ 
मिटटी में फैली हुई खुशबु वो खास 
छूकर  जिसे हो ममता का आभास 
घने पीपल की शाख पर बैठी कोयल के पास 
हो  रहा है  अपनी मातृभूमि की गोद में सोने  का आभास |


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Comment by Rekha Joshi on August 15, 2012 at 12:56pm

घने पीपल की शाख पर बैठी कोयल के पास 

हो  रहा है  अपनी मातृभूमि की गोद में सोने  का आभास |,बहुत बढ़िया रचना रोहित जी ,बधाई 

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