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राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- २१

आज का दिन भी...

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आज का दिन भी फंस गया है मोटरगाड़ियों की ट्राफिक में. आहिस्ता आहिस्ता रेंग सा रहा है धूप की बरसाती के नीचे, मैं साफ़ देखा रहा हूँ अपने ऑफिस की खिडकी पे खड़ा. लोग किधर और क्यूँ भागते रहते हैं अपने अपने घरों से निकल कर, मैं इस ख्याल को किसी शायर के तखय्युल की हवा देता हूँ, कि आखिर क्यूँ? क्यूँ शिताबी सी मची रहती है ज़िंदगी में, कि लोगों के पास हर वक्त वक्त क्यूँ नहीं होता जबकि वक्त के बगैर कोई भी वक्त मुहय्यानहींहै?

 

गर्मियों में दिन का रंग कितना तेज़ होता है, ये दिख रहा था उन दरख्तों के सूखे शज़र में जो इस तेज़ी से ज़र्द पड़ गए थे. एक चिड़िया उड़ती- उड़ती सी आती है और शाखों में खो जाती है, शायद इसे भी आज का दिन किसी भूलभुलय्या सा लग रहा था जिससे निकल पाना एक मुश्किल काम हो.

 

मैं वाफिस खिड़की से अपनी मेज़ पे आके बैठ जाता हूँ. फाइलों का अम्बार, लैपटॉप पे खुले अनगिनत विन्डोज़, मोबाइल और ऐसे ही दीगर इलेक्ट्रोनिक गजेट्स के तारों का बिखराव- मेरा टेबल भी पुणे की सड़कों की ट्रैफिक का कोई नज़ारा हो जैसे जहाँ मेरी बेबसी आहिस्ता आहिस्ता रेंग सी रही है.

 

© राज़ नवादवी

पुणे, १४/०३/२०१२ 

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