For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गरचे तेरे ख़याल का मेयार हम नहीं

नमस्कार अहबाब, तरही मुशायरा २३ में वक़्त पर मैं कोई ग़ज़ल नहीं कह पाया, क्योंकि तब तक मैं इस परिवार का हिस्सा ही नहीं था. अब उस मिसरे पर ख़ामा घिसाई का मन हुआ तो कुछ अश'आर कह दिए. आपकी नज़्र हैं, कोई ग़लती या ऐब दिखाई दे तो बेशक़ इत्तेला करें

****

गरचे तेरे ख़याल का मेयार हम नहीं
तो क्या तेरी तलब से भी दो-चार हम नहीं

वो चारागर है, सोचके मरता है दिल का हाल
आज़ार तो यही है कि बीमार हम नहीं

ऐ जान-ए-जान ग़ौर से देख इन्तहा-ए-शौक़
ख़ून-ए-जिगर है हम पे, हिनाज़ार हम नहीं

मरते हैं, मर नहीं सके, तेरे फ़िराक़ में
कहता है कौन इश्क़ में नाचार हम नहीं

फ़ारिग़ हैं दिलबरी से ब_क़द्र-ए-जूनून-ए-शौक़
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

जी ने बनाया दर्द को गोर-ए-दिल आख़िरश
कूचा-ए-इश्क़ में किसी पे बार हम नहीं

हैं और भी वबाल यहाँ, बाद-ए-ख़स्तगी
रह्न-ए-जुनूँ हैं कुश्ता-ए-आज़ार हम नहीं

हासिल है दिल को दर्द-ए-ज़माना का साथ भी
लेकिन तेरे ख़याल से बेज़ार हम नहीं

आशिक़ हैं हम तो छेड़ हमें जिस क़दर बने
अब क्या तेरे सितम के भी हक़दार हम नहीं

**********

मेयार = standard ; तलब=हसरत ; हिनाज़ार = मेंहदी लगे हुए ; मरते हैं = दुखी हैं (तड़पते हैं) ; नाचार=मजबूर ; फ़ारिग़.....शौक़ = शौक़ के जूनून में दिलबरी छोड़ दी है ; गोर-ए-दिल = दिल की कब्र ; आखिराश=आखिर में ; बाद-ए-ख़स्तगी = टूट जाने के बाद ; रहन-ए-जुनूँ = जूनून के हाथों गिरवी ; कुश्ता-ए-आज़ार=बीमारी से मारे हुए ;

 

Views: 1994

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Vipul Kumar on July 1, 2012 at 6:51pm

Shukriya Raj bhai :)

Comment by Raj Tomar on July 1, 2012 at 6:24pm

 Vipul Bhai, Aap ki ghazal to bahut hi khoobsurat hai..:)

   che khush.. :)

Comment by Vipul Kumar on July 1, 2012 at 5:04pm

Shukriya arun kumar nigam jii.....

aapne zarre ko nawazish ke qabil samjha yahi bahut hai....

aur us misre meN "sochkar" ko "sochke" padheN, phir shayad bikhraav door ho jaaye zehn meN.......:)

Comment by Vipul Kumar on July 1, 2012 at 5:03pm

Shukriya Arun Kumar Pandey 'Abhinav' ji. aapne waqt diya padhne aur samajhne meN uske liye tah-e-dil se shukrguzaar huN.....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on July 1, 2012 at 2:56pm

प्रिय श्री विपुल कुमार जी, उम्दा गज़ल लिखी है.

आशिक़ हैं हम तो छेड़ हमें जिस क़दर बने
अब क्या तेरे सितम के भी हक़दार हम नहीं.

इस अश'आर के लिये खास तौर पे दाद कबूल कीजिये.

वो चारागर है, सोचकर मरता है दिल का हाल,  हालांकि आपने  सब कुछ समझा दिया है मगर पता नहीं क्यों कुछ अटक सा रहा है. बंधा हुआ सा नहीं लग रहा है, कुछ बिखराव सा लग रहा है.एक बार फिर से गौर करके देखें.

Comment by Abhinav Arun on July 1, 2012 at 2:01pm

थोड़ी कठिन है हम हिंदी वालों के लिए , पर कुछ शेर ध्यान खींचते हैं इस हेतु बधाई आपको \ ये शेर ख़ास लगा -

हासिल है दिल को दर्द-ए-ज़माना का साथ भी
लेकिन तेरे ख़याल से बेज़ार हम नहीं ..!

लिखना और सीखना ओ बी ओ का जिंदाबाद नारा है \ हम सब इसके झंडाबरदार हैं !!शुभकामनाएं !!

Comment by Vipul Kumar on July 1, 2012 at 1:36pm

jee haaN. shukriya


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 1, 2012 at 1:33pm

मेरी उलझन को दूर करने के लिये हृदय की गहराइयों से आपको धन्यवाद कह रहा हूँ.  वैसे यह मिसरा कुछ और खुल सकता था.

इस शेर को दुबारा लिख रहा हूँ --

वो चारागर है, सोच के मरता है दिल का हाल
आज़ार तो यही है कि बीमार हम नहीं

Comment by Vipul Kumar on July 1, 2012 at 1:25pm

बहुत बहुत धन्यवाद सौरभ जी, की आपने इस छोटी सी कोशिश को पढ़ा और सराहा.

वो चारागर है सोचकर मरता है दिल का हाल
आज़ार तो यही है की बीमार हम नहीं
कहने का मा'ना है कि मेरा दिलबर चारागर है. लेकिन मैं बीमार नहीं हूँ. तो यही सोच सोचकर मेरे दिल की हालत ख़राब हो रही है कि अगर मैं बीमार होता तो उससे मिल सकता था. या'नी अब यही मेरी बीमारी(दुविधा) हो गई है कि मैं बीमार क्यों नहीं हूँ.
ग़ज़ल पर आपकी बेशक़ीमती राय के लिए एक बार फिर शुक्रिया अदा करता हूँ. साथ बनाए रखें.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 1, 2012 at 12:55pm

भाई विपुलकुमारजी, आपकी इस ग़ज़ल पर इतना ही कहूँगा कि आपकी कोशिश रंग लायी है. और आपने कमाल किया है. वैसे ग़ज़ल के सभी शेर कहन के लिहाज से कमोबेश एक तरह के भावों के गिर्द घूमते हैं. मग़र जो कुछ आपने कहा है उसका लिहाज मुत्मईन करता है.

इन अश’आर पर मेरी विशेष बधाई लें. हृदय की गहराइयों से महसूस कर रहा हूँ -

मरते हैं, मर नहीं सके, तेरे फ़िराक़ में
कहता है कौन इश्क़ में नाचार हम नहीं

आशिक़ हैं हम तो छेड़ हमें जिस क़दर बने
अब क्या तेरे सितम के भी हक़दार हम नहीं ....   वाह वाह वाह !!

आपने ग़िरह भी क्या खूब लगायी है.  बहुत खूब !

 

वो चारागर है, सोचकर मरता है दिल का हाल 

इस मिसरे ने मुझे उलझा रखा है. आप तकतीह भी करें और मायना भी कहें.  हम शुक़्रगुज़ार होंगे.

 

इस ग़ज़ल का मेयार भाषा के कारण अलहदा है.  अच्छा है आपने कठिन शब्दों के अर्थ दे दिये हैं.

इस ग़ज़ल के लिये पुनः बधाई और हृदय से धन्यवाद.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . .बेटी

कुंडलिया. . . . बेटीबेटी  से  बेटा   भला, कहने   की   है   बात । बेटा सुख का   सारथी, सुता   सहे …See More
2 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' posted a blog post

हादिसाते-शायरी (नज़्म) – रवि भसीन 'शाहिद'

दावतनामा हमको आया एक मुशायरे में शिरकत काजिस में अपनी शायरी पढ़ना बाइस था बेहद इज़्ज़त काकिया इरादा…See More
2 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"  सरसी छंद  : मकर संक्रांति  अनूठे     संस्कार   …"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्रानुरूप सुंदर छंद हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
7 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"जय हो "
22 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"सरसी छंद +++++++++ उषा काल आरम्भ हुआ तब, अर्ध्य दिये नर नार। दूर हुआ अँधियारा रवि का, फैले तेज…"
23 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Jan 18
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Jan 18
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Jan 18

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service