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मैं काँटों का रस्ता हूँ

तुझको साया कहता हूँ ,  खुद भी तेरे जैसा हूँ

सागर हूँ गहरा लेकिन,  लहरें कहती तन्हा हूँ

मुझसे क्यूँ शरमाते हो,  मैं तो बस आईना हूँ

कहलो गंदा जितना तुम, मैं बस अच्छा सुनता हूँ

आँखों से पीकर के भी, तिश्ना है मैं प्यासा हूँ

तू फूलों की क्यारी है, मैं काँटों का रस्ता हूँ

तुमको पाया तब जाना,  इंसां हूँ औ जिन्दा हूँ

तुमसे "दीप" ये रोशन है, तुम बिन मैं खुद अँधा हूँ

संदीप पटेल "दीप "

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Comment

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Comment by Rekha Joshi on June 4, 2012 at 7:11pm

sandeep ji ,

आँखों से पीकर के भी, तिश्ना है मैं प्यासा हूँ 

तू फूलों की क्यारी है, मैं काँटों का रस्ता हूँ ,bahut khub ,badhai 

Comment by chandan rai on June 4, 2012 at 5:12pm
संदीप पटेल जी
तू फूलों की क्यारी है, मैं काँटों का रस्ता हूँ

तुमको पाया तब जाना, इंसां हूँ औ जिन्दा हूँ

i like these lines most

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 4, 2012 at 4:31pm

बहुत खूब !

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 4, 2012 at 4:23pm

आदरणीय संदीप जी, सादर 

जीवन का अहसास जरूरी है , बधाई 

Comment by Yogi Saraswat on June 4, 2012 at 3:35pm

तुमको पाया तब जाना,  इंसां हूँ औ जिन्दा हूँ

तुमसे "दीप" ये रोशन है, तुम बिन मैं खुद अँधा हूँ

बढ़िया लेखन श्री संदीप पटेल जी , बधाई एक अच्छी रचना के लिए

Comment by Albela Khatri on June 3, 2012 at 10:25pm

waah waah !

bahut khoob kaha ji.........

Sandeep Patel DEEP ji...badhaai !

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