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जैसे ही मैंने दरवाजा खोला 
भारत माँ व्यथित खड़ी थी 
बेगैरत जुलूस निकल रहे थे 
संस्कृति जमीन में गडी थी 
झूठ के महल दमक रहे थे 
सच्चाई झोंपड़ी में पड़ी थी 
अमीरी के झरने बह रहे थे 
गरीबी तुच्छ पंक में सड़ी थी 
भ्रष्टाचारी अट्टाहस कर रहे थे 
नेक नयन में अश्रु की झड़ी थी 
वृक्ष और पर्वत कट रहे थे 
पर्यावरण में खूब हड़बड़ी थी 
तपिश से हिम नद पिघल रहे थे 
सुनामी तबाही पे अड़ी थी 
देखकर स्नायु तंत्रिकाओं ने द्वन्द किया 

क्षण भर को गरल अखंड पिया 
और मैंने दरवाजा बंद किया |

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Comment by Ashok Kumar Raktale on June 2, 2012 at 7:39am

राजेश जी
         सादर,
क्षण भर को गरल अखंड पिया
और मैंने दरवाजा बंद किया |
हकीकत को बयान कराती सुन्दर रचना, आपने दरवाजा बंद किया ये तो ठीक है किन्तु उनको क्या कहें जिन्हें यूँ दरवाजे बंद होने से रोकने का कार्य सौंपा है? बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 1, 2012 at 8:24am

प्रिय महिमा श्री बहुत बहुत हार्दिक आभारी हूँ मेरी कविता के मर्म तक पहुँचने के लिए 

Comment by MAHIMA SHREE on May 31, 2012 at 10:24pm

आदरणीया राजेश दी , नमस्कार आपकी इस रचना ने मुझे चकित भी किया और भीतर जाकर कही अटक सा गया .. वाकई में ऐसा ही तो सभी कर रहे है ... सच्चाई से रूबरू कराती रचना के लिए बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 31, 2012 at 5:29pm

योगी सारस्वत जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Yogi Saraswat on May 31, 2012 at 5:13pm

क्षण भर को गरल अखंड पिया 
और मैंने दरवाजा बंद किया |

कभी कभी ऐसे हालातों में यही करना मुनासिब होता है ! बेहतरीन रचना , आदरणीय राजेश कुमारी जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 31, 2012 at 4:54pm

बहुत बहुत आभार संदीप कुमार जी 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 31, 2012 at 3:09pm

ऐसे मैं द्वार बंद कर देना ही अच्छा रहा आपका
बहुत खूबसूरती से लिखा आपने
बधाई आपको इस रचना के लिए


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 31, 2012 at 12:17pm

हार्दिक आभार योगराज जी बहुत ख़ुशी होती है अपने उद्देश्य को सार्थक पाकर मेरी लेखनी को बल मिला 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 31, 2012 at 12:11pm

हार्दिक  आभार सौरभ पाण्डेय जी यही तो हो रहा है आजकल सच्चाई से मुंह मोड़कर बैठने का वक़्त नहीं है वक़्त है हालात को सुधारने  का


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2012 at 12:04pm

कविता अपना सन्देश देने में सफल रही है, अत: मेरी दिली बधाई स्वीकार करें राजेश कुमारी जी.

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