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ग़म ज़िंदगी में देख के रोया नहीं कभी

ग़म ज़िंदगी में देख के रोया नहीं कभी।

अश्क़ों से अपने गाल भिगोया नही कभी॥

 

हर सिम्त है धुआं यहाँ हर सिम्त आग है,

इस खौफ़ से ही चैन से सोया नही कभी॥

 

दिल में जिगर में था वही साँसों में वही था ,

आँखों के सामने से वो खोया नही कभी॥

 

ख़ुशबू बदन की उसके ना उड़ जाये इसलिए,

बिस्तर की अपने चादरें धोया नही कभी॥

 

लेकर बहुत से दर्द वो चुपचाप मर गया,

कांटे किसी की राह में बोया नही कभी॥

 

मज़बूरियाँ थी ज़िंदगी भर साथ में मगर,

रिश्तों को बोझ जान के ढोया नही कभी॥

 

यह सोचकर कि फूल के सीने में भी है दिल,

“सूरज” सुई से हार पिरोया नही कभी॥

 

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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Comment

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Comment by Ajay Singh on June 6, 2012 at 9:38am

फूल के सीने में भी है दिल,

“सूरज” सुई से हार पिरोया नही कभी.....      अति सुन्दर ......

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 2, 2012 at 7:32am

कृपया करने को कहने पढ़ें.धन्यवाद.

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 2, 2012 at 7:31am

आदरणीय बाली जी
                सादर नमस्कार, बहुत सुन्दर गजल मजा आगया किन्तु एक शेर पढ़कर तो बस उफ़! मोहब्बत करने को ही मन किया. बधाई.
ख़ुशबू बदन की उसके ना उड़ जाये इसलिए,
बिस्तर की अपने चादरें धोया नही कभी॥

Comment by MAHIMA SHREE on May 31, 2012 at 10:33pm

दिल में जिगर में था वही साँसों में था वही,

आँखों के सामने से वो खोया नही कभी॥

 

ख़ुशबू बदन की उसके ना उड़ जाये इसलिए,

बिस्तर की अपने चादरें धोया नही कभी॥

 

लेकर बहुत से दर्द वो चुपचाप मर गया,

कांटे किसी की राह मे बोया नही कभी॥

आदरणीय डॉ सूरज जी .. आप की गज़ल तो बहा ले जाती है ... हर बार की तरह .उम्दा ..

बधाई स्वीकार करें

Comment by Yogi Saraswat on May 31, 2012 at 4:58pm

ख़ुशबू बदन की उसके ना उड़ जाये इसलिए,

बिस्तर की अपने चादरें धोया नही कभी॥

 

लेकर बहुत से दर्द वो चुपचाप मर गया,

कांटे किसी की राह मे बोया नही कभी॥

आदरणीय श्री डॉ. बाली , आपकी गज़लें हमेशा ही उच्च स्तर की होती हैं ! ये भी वही स्तर की है ! उच्चतम ! बहुत सुन्दर ! हर शेर खूबसूरत   ! बधाई ! किन्तु सिम्त का मतलब समझ नही आया ! कृपया बताएं !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 31, 2012 at 3:10pm

ख़ुशबू बदन की उसके ना उड़ जाये इसलिए,

बिस्तर की अपने चादरें धोया नही कभी॥

 

bahut khoob sir ji ........................waah kya baat hai


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2012 at 12:02pm

वाह वाह वाह डॉ बाली साहिब, बहुत ही उम्दा अशआर कहे हैं. मतले से मक्ते तक एक से बढ़कर एक. किसी एक को हासिल-ए-ग़ज़ल कहना बाकियों के साथ नाइंसाफी होगी. एक शे'र की तरफ आपकी तवज्जो चाहूँगा :

//दिल में जिगर में था वही साँसों में था वही,
आँखों के सामने से वो खोया नही कभी॥//

मिसरा-ए-अव्वल में अंत में "वही" और सानी के अंत में "कभी" आ जाने से तकाबुल-ए-रदीफ़ का ऐब आ गया है. इस पर नज़र-ए-सानी अवश्य फरमा लें, सादर.   

Comment by UMASHANKER MISHRA on May 30, 2012 at 10:26pm

हर सिम्त है धुआं यहाँ हर सिम्त आग है,

इस खौफ़ से ही चैन से सोया नही कभी॥

क्या बात है ...क्या बात है बहुत खूब

Comment by arunendra mishra on May 30, 2012 at 6:42pm

ग़म ज़िंदगी के देख के रोया नहीं कभी।

अश्क़ों से अपने गाल भिगोया नही कभी

दिल को छूने वाली पंक्तिया ....सुन्दर अति सुन्दर 

Comment by Albela Khatri on May 30, 2012 at 4:58pm


बहुत बहुत  बधाई डॉ  सूर्या बाली "सूरज"  साहेब,

मज़ा आ गया ..बहुत ख़ूब कहा . हर शे'र में एक बात है . लेकिन   मुझे लगता है  कुछ अक्षर या शब्द बार बार रिपीट हो रहे हैं  अथवा  कुछ शब्द  लिंगभेद का  भी शिकार हो रहे हैं .  बुरा न मानना . मैं ख़ुद ग़ज़ल में  अभी नौसिखिया हूँ  लेकिन   कुछ सुझाव दे रहा हूँ ......जँचे  तो काम में ले  लें  अन्यथा  डिलीट कर दें
सादर


ग़म ज़िंदगी के देख के रोया नहीं कभी। _____ग़म  ज़िन्दगी में

अश्क़ों से अपने गाल भिगोया नही कभी॥____अश्क़ों से अपना 

 

हर सिम्त है धुआं यहाँ हर सिम्त आग है,

इस खौफ़ से ही चैन से सोया नही कभी॥ ____इस खौफ़ में   --या--इस खौफ़  से ही रात भर 

 

दिल में जिगर में था वही साँसों में था वही,

आँखों के सामने से वो खोया नही कभी॥

 

ख़ुशबू बदन की उसके ना उड़ जाये इसलिए,____ख़ुशबू -ए-बदन उसकी न

बिस्तर की अपने चादरें धोया नही कभी II  ____बिस्तर की चादरों को भी 

 

लेकर बहुत से दर्द वो चुपचाप मर गया,

कांटे किसी की राह मे बोया नही कभी॥    ____कांटा

 

मज़बूरियाँ थी ज़िंदगी भर साथ में मगर,

रिश्तों को बोझ जान के ढोया नही कभी॥

 

यह सोचकर कि फूल के सीने में भी है दिल,

“सूरज” सुई से हार पिरोया नही कभी॥

 

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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