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दोहा मुक्तक : गाँव ....

मुक्तक : गाँव .....

मिट्टी का घर  ढूँढते, भटक  रहे  हैं  पाँव।
कहाँ गई पगडंडियाँ, कहाँ गए वो  गाँव ।
पीपल बूढ़ा हो गया, मौन हुए सब  कूप -
काली सड़कों पर हुई, दुर्लभ ठंडी छाँव ।
                  *******
कच्चे घर  पक्के  हुए, बदल  गया  परिवेश ।
छीन लिया हल बैल का, यंत्रों  ने अब देश ।
बदले- बदले अब लगें , भोर साँझ  के  रंग  -
वर्तमान  में  गाँव  का, बदल  गया  है  पेश ।
(पेश =रूप, आकार )
                     ********
गाँवों ने भी ले लिया , अब शहरों का रूप ।
हरियाली ओझल हुई , लुप्त हुए सब कूप ।
घूंघट जैसे  हो  गया, बीते  युग  की  बात -
कंक्रीट  के  गाँव  में, छाया  खाती  धूप ।

सुशील सरना / 11-7-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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