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अहसास की ग़ज़ल: मनोज अहसास

22  22   22  22  22  2

मेरे दिल का बोझ किसी दिन हल्का हो.
मिल ले तू इक बार अगर मिल सकता हो.

मुझको लगता है तू मुझको भूल गया,
तेरे मन में भी शायद कुछ धोखा हो.

तेज तपन के साथ है सूरज अब सर पर,
मेरी दुआ है तेरे सर पर कपड़ा हो.

मैं तुझको खुद में शामिल कैसे रक्खूँ,
तेरे नाम के आगे जब कुछ लिक्खा हो.

अब तो अपनेपन की तुझमें बात नहीं,
शायद तू अब मुझको ग़ैर समझता हो.

छोटी सी एक बात बतानी थी तुझको,
पढ़ लेना गर पास कोई ख़त रक्खा हो.

जितना मैंने कहा है तुझको ग़ज़लों में,
इससे ज्यादा क्या कोई कह सकता हो.

मंज़िल उसको कभी नहीं मिलती जग में,
जिनको लगता है आगे कुछ खतरा हो.

सारी दुविधा मेरे हिस्से आई है,
तू ही चुन ले गर मुझको चुन सकता हो.

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 11, 2020 at 12:36pm

मिल ले तू इक बार अगर मिल सकता हो//

मेरे समझ से यह ऐसे होना चाहिए

"मिल ले तू इक बार अगर मिल सकते हो"

इसी तरह कुछ और भी देखियेगा... बहरहाल बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by रामबली गुप्ता on July 7, 2020 at 6:06pm

मनोज जी ग़ज़ल पर प्रयास के लिए बधाई स्वीकारें।कुछ बाते-

मिल सकता हो>मिल सकना हो

कोई कह सकता हो<कोई कह सकता है

आगे कुछ खतरा हो<आगे कुछ खतरा है

चुन सकता हो<चुन सकता है

जरा देखें इन कथ्यों को

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