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असाधारण सवाल

यह असाधारण नहीं है क्या

कि डूबती संध्या में

ज़िन्दगी को राह में रोक कर

हार कर, रुक कर

पूछना उससे

मानव-मुक्ति के साधन

या पथहीन दिशा की परिभाषा

असाधारण यह भी नहीं है कि

ज़िन्दगी के पाँच-एक वर्ष छिपाते

भीगते-से लोचन में अभी भी हो अवशेष

नूतन आशा का संचार

चिर-साध हो जीवन की

सच्चे स्नेह की सुकुमार अभिलाषा

पर असाधारण है, बैठे-बैठे

बीत गए अधूरे सपनों को समेटते

सूरज के सरक जाने के बाद

दर्द भरे अनुभवों की पिटारी खोल

बुद्धि, हृदय और विवेक के ताल-मेल में

लौट आना स्वप्न लोक-सा

कुछ और जी लेने का अथक उत्साह

इतना, कि हाथ बढ़ाया तो मानो

क्षितिज को छू आया

मालूम है, मालूम है मुझको

कहाँ से, कैसे उत्पन्न हुआ है यह

नव उन्माद से प्रोत्साहित

नव स्वप्न का मधुरम उत्साह

परि-लोक-सा स्नेह का मधु-आह्वान

पत्थरों की राह पर पत्थरों के बीच

उग आई है बेमौसम नई घास 

प्रिय के मात्र मधुरतम स्नेह-संस्पर्ष से

रात रानी के नशे-सी आजकल

बढ़ गई है अभी चलते जाने की चाह

है उल्लसित मधुर आराधना

पुराने धूलभरे तानपुरे के तारों से भी

आ रही है पथ-दर्शक मृदु झंकार

मिला जब से इस कवि-मन को, प्रिय

तुम्हारे प्यार भरे आँचल का उपहार

                   -----

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 64

Comment

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Comment by vijay nikore on April 18, 2020 at 7:02pm

आपका हार्दिक आभार, मित्र नरेन्द्रसिंह जी

Comment by narendrasinh chauhan on April 10, 2020 at 1:45pm

खूब सुंदर रचना 

कृपया ध्यान दे...

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