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कल नींद में हमने एक सपना देखा।
देखा कि ,मेरा देश बदल गया है।।
जाति ,धर्म का नहीं है रगड़ा
ऊंच-नीच का खत्म है झगड़ा।।
नारी का नहीं है शोषण,
गरीब को भरपूर है पोषण।
सब के, भंडार भरे हैं,
निठल्ले भी काम करें हैं।
ना अपराधों की कही है गंध,
थाना ,कचहरी सब है बंद।
नेता सब सुधर गए हैं,
भ्रष्टाचारी ना जाने किधर गए हैं।
ना रिश्वत है ,ना चित्कार कहीं,
है शांति चहु ओर,
पर जब नींद खुली तो देखा, हकीकत है कुछ और।।

द्वारा भूपेंद्र सिंह राणावत
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 31, 2020 at 2:37pm

जनाब भूपेंद्र सिंह राणावत जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

एक निवेदन ये कि रचना पर आई टिप्पणी के उत्तर यहीं देना उचित होता है,संज्ञान लें ।

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