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गाँव के कच्चे घरों में
जहाँ दीवारों पर
पुती होती है पीली मिट्टी
और ज़मीन पर गेरू,
बच्चे बनाया करते हैं 
चित्र,
खींच देते हैं लकीरें
आड़ी-तिरछी,
इधर-उधर  

फिर जब माँ पोछा लगाती है
लिपाई करती है
मिट्टी और गेरू से,
धुल जाती हैं लकीरें
फिर बच्चे चित्रकारी करते हैं
लकीरें खींचते हैं,
फिर माँ लिपाई करती है
और
क्रम अनवरत चलता रहता है

शहर के पक्के घरों में
जहाँ दीवारों पर
लगा होता है मँहगा 'पेन्ट'
और ज़मीन पर बिछे होते हैं
'
टायल्स',
बच्चे चित्रकारी नहीं करते

दीवारों पर कोशिश भी करें
कुछ लिखने की,
तो पड़ जाती है डांट पिता की

और कभी मार भी, यह कहकर -
मकान मालिक आयेगा तो डांटेगा,
बड़ी मुश्किल से मिला है घर
किराये का ।


बच्चों की असँख्य कल्पनाएँ
घुट जाती हैं भीतर ही,
दब जाता है बचपन
मँहगे 'पेन्ट' और 'टायल्स'

की कीमत तले


 आशीष  नैथानी  'सलिल'
 
हैदराबाद

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Comment

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 8, 2013 at 1:05am

प्रिय सलिल जी  महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना पुरस्कार से सम्मानित होने के लिए आपको बहुत-२ बधाईयां और शुभकामनाएं.सुन्दर वर्णों से सजी माला  प्यारी गजलें ..........ये कारवाँ यूं ही सतत बढे ...शुभ कामनाएं ...

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 
कुल्लू हिमाचल 
(प्रतापगढ़ उ प्रदेश )

 /


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 1, 2013 at 12:56pm

आदरणीय आशीष जी, 

सही कहा आपने... बच्चों की कल्पनाओं को उन्मुक्त उड़ान के लिए हम पंख पसारने ही नहीं देते.. बच्चों में सहज अभिव्यक्ति का एक प्रचंड रूप है दीवारों पर लिख देना, विविध आकृतियों को बनाना ...जो आज के बढते शहरीकरण और आलीशान इमारतों में अस्वीकार्य सा हो गया है...

इस सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई 

देखिये एक रूप बाल अभिव्यक्ति का.... माँ के दिए गेरू के घोल से बच्चा कैसे फर्श को रंगता है...  

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on May 1, 2013 at 11:40am

आदरणीय Vijay Nikore जी, आदरणीय  Kewal Prasad जी 

ह्रदय-तल से आपका आभार व्यक्त करता हूँ !

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on May 1, 2013 at 11:38am

आदरणीया Usha Taneja जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका |

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on May 1, 2013 at 11:36am

आदरणीय Laxman Prasad Ladiwala जी, ये तो बहुत ही अच्छी बात है कि आपके पोते-पोतियाँ कलाकारी करते हैं और आप उनकी कला का अनुमोदन !  :)

कविता पसंद करने हेतु हार्दिक आभार आदरणीय !!!

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on May 1, 2013 at 11:33am

आदरणीय Rajesh Kumar Jha जी । समय के साथ बहुत कुछ पीछे छूटता जाता है। लेकिन दुखद ये कि शहरीकरण में आज के बच्चे प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं । बस कोशिश है इस ओर ध्यान दिलाने की ।

आपको कविता पसंद आई, हार्दिक आभार  !!!

Comment by वेदिका on April 30, 2013 at 11:04pm

बहुत सुन्दर काव्य रचा है आपने अतुकांत काव्य शैली में .....
बचपन के घुट जाने का मार्मिक वर्णन ...
अब आज का जमाना बहुत आगे है ..बच्चे ms वर्ड पे पेंटिंग करने लगे है, और ब्लॉग में स्कैन करा के रातों रात ग्लोबल हो जाते है ..ये बात अलग है की वे बचपन में ही जवान हो जाते है 

शुभकामनाये स्वीकारिये आशीष जी! 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 30, 2013 at 10:24pm

बहुत-बहुत शुक्रिया भाई मनोज शुक्ला जी !!!

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 30, 2013 at 9:59pm

आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी, बहुत-बहुत शुक्रिया सर।

कविता को आपका अनुमोदन प्राप्त हुआ तो लिखना सार्थक हो गया ।

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 30, 2013 at 8:28pm

आदरणीय अजय जी, कविता पसंद करने हेतु हार्दिक अभिनन्दन ।

कृपया ध्यान दे...

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