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हाँ! मैं हूँ परमेश्वर.

हाँ! मैं हूँ परमेश्वर.
मैं बन बैठा भगवान,
मंदिर में,सबके दिल में.
गाँव-गाँव व शहर-शहर,
मैं घूमता रहा पहर-पहर,
चंदे के लिए,मंदिर के वास्ते,
मिल गए मुझे भाग्य के रास्ते.
सुबह निकलता बिना नहाए-खाए,
लंबा चंदन टीका करता,
कंधे में झोला लटकाता,
लगता पंडित भोला-भाला.
मंदिर के नाम की रसीद
हाथ में रहती,कटती रहती,
मैं घूमता रहता,काटता रहता,
अपने अभाग्य को,रसीद के साथ.
लोग चंदे के साथ भोजन भी कराते,
रात को हम वहीं भरते खर्राटे.
धीरे-धीरे कट गई सारी रसीद,
दोस्तों ने समझाया मत बन धर्मी,
कर ले कोई बिजनेस.
मैं भी सोचा,भाड़ में जाए मंदिर,
अब चमकेगी अपनी मंजिल,
होंगे नौकर-चाकर,बंगला अपनी मोटर.
तभी आया मेरा बेटा,बोला,
मंदिर के लिए मैं कर चुका तैयारी,
काम आयी चमचों की यारी.
आप अब नानुकुर छोड़कर,
तन,मन,धन मंदिर को समर्पित कर दें,
अपना सर्वस्व उसमें अर्पित कर दें.
न चाहते हुए भी बेटे की बात मान ली,
भव्य मंदिर बनवाने की ठान ली.
शहर के पास दस एकड़ जमीन,
मंदिर के नाम मिल गई,अहा यह क्या,
मंदिर बनकर हो गया तैयार
और मेरी बुद्धि खुल गई,
मैं बन बैठा पुजारी मंदिर का.
मंदिर पर भक्तों की भीड़
लगी रहती है,प्रतिदिन,प्रतिछड़.
वे आते हैं,प्रभु को भेंट चढ़ाते हैं,
जाते वक्त,मेरे आशिर्वाद के लिए,
शीश झुकाते हैं,मालमुद्रा थमाते हैं.
कुछ दिनों बाद,बेटा फिर बोला,
मंदिर के द्नार पर लगे गेट को,
सबके लिए खोल दीजिए,
लंगड़े,अंधे,भिखारियों को भी
अंदर आने दीजिए.
मैंने कहा बेटा,वे गरीब,बेचारे
भेंट क्या चढ़ाएँगे,
उल्टे शोर मचाएँगे.
बेटा मुस्कुराया,मुझे समझाया,
आज तक आप खुद कहते आएँ हैं
कि मैं हूँ भगवान,
पर अब दूसरे भी मानेंगे आपको ईश्वर,
सत्य,धर्मरक्षक परमेश्वर.
देखते ही देखते,मंदिर के द्नार पर,
भीखमंगों की पंक्ति लग गई,
उनके "हे!मालिक कुछ दे दे
भगवान भला करेगा" की आवाज से,
मंदिर के घंटे की आवाज दब गई.
मैंने किया उनके सोने व रहने का प्रबंध.
इसके बदले मैं उनसे कुछ न लेता,
वे जो भी पाते,आधे मंदिर में चढ़ाते.
यह थी मेरे बेटे की चाल,
बहुत ही अच्छा हो गया मेरा हाल.
बड़े-बड़े व्यापारी,खड्डर टोपीधारी,
"भीखमंगा उत्थान कमेटी"
के नाम,करने लगे लाखों का दान.
अब मैं योगी के साथ-साथ हूँ भोगी.
भीखमंगे और भक्तों का ईश्वर.
हाँ! मैं हूँ परमेश्वर.

-प्रभाकर पाण्डेय "गोपालपुरिया"

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Comment

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Comment by satish mapatpuri on July 7, 2010 at 4:57pm
हाँ! मैं हूँ परमेश्वर.
मैं बन बैठा भगवान,
मंदिर में,सबके दिल में.
गाँव-गाँव व शहर-शहर,
मैं घूमता रहा पहर-पहर,
चंदे के लिए,मंदिर के वास्ते,
मिल गए मुझे भाग्य के रास्ते.
सुबह निकलता बिना नहाए-खाए,
धरम को आज कारोबार बना दिया गया है. आपने यथार्थ का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है. बहुत-बहुत धन्यवाद, प्रभाकर जी .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 7, 2010 at 11:30am
एकदम से पोल खोल कर रख दी है आपने......धार्मिक श्रद्धा की आड़ में जनता को छलने वाले लोगों का कच्चा चिटठा खोल कर रख दिया है आपने .........एक सुन्दर रचना.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 7, 2010 at 11:00am
बहुत सही प्रभाकर भैया , अब तो धर्म के नाम पर यही सब हो रहा है, धर्म का ठेका अधर्मियों के हाथ मे आ गया है और धर्म को व्यवसाय बनाकर भारत की धर्म भिडू जनता को लूट रहे है वो भी प्रेम से भगवान के नाम पर , लुटाने वाला भी खुश लुटने वाला भी खुश, जय हो ,

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