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मेरी दादी [गीत ] प्रतिभा पांडे

ऊन सलाई संग दादी का

बहुत पुराना था याराना

चपल उँगलियों का दादी की  

जाड़े ने भी लोहा माना

 

छत पर जब दादी को पाती

धूप गुनगुनी  मिलने आती

ख़ास सहेली बन दादी की  

वो भी फंदों से बतियाती

 

सीधे पर दो उल्टे फंदे

बुनता जाता ताना बाना

 

कल जो था बाबा का स्वेटर

अब छोटू का टोपा मफलर

नई पुरानी ऊनों के संग

चपल उँगलियाँ चलतीं सर सर

 

इस रिश्ते से उस रिश्ते तक

गर्माहट का आना जाना

 

सीधी चाची ,टेढ़ी ताई

पढ़ी लिखी मँझली भौजाई

बिखर नहीं पाता था कोई

रहते सब बंध एक सलाई

 

थी भोली वो अनपढ़ दादी

हर दिन जिसने उत्सव माना

 

 

 मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 21, 2016 at 5:02pm

आदरनीया , ऊन के ताने बाने के सातह रिश्ते को जीता आपका गीत , बहुत सुन्दर लगा , हार्दिक बधाई ।

Comment by Mahendra Kumar on December 21, 2016 at 11:26am
बहुत ही भावपूर्ण गीत है आदरणीया प्रतिभा जी। बहुत-बहुत बधाई। सादर।
Comment by pratibha pande on December 21, 2016 at 11:17am

आदरणीय मिथिलेश जी आपको गीत का ये प्रयास प्रभावित कर पाया ..रचना कर्म सफल हुआ   आपका हार्दिक आभार 

Comment by pratibha pande on December 21, 2016 at 11:13am

हार्दिक आभार आदरणीय श्याम नारायण जी 

Comment by pratibha pande on December 21, 2016 at 11:12am

आदरणीय समर कबीर जी , प्रयास पर आपकी उपस्थिति और अनुमोदन से रचना कर्म सफल हुआ आपका हार्दिक आभार ...सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 20, 2016 at 11:59pm

आदरणीया प्रतिभा जी, आपकी प्रस्तुतियाँ कभी-कभी चकित कर देती हैं और मुग्ध होकर वाह निकल जाती है.  दादी पर लिखा यह गीत उसी श्रेणी का है. एक शानदार गीत. ऐसे गीत कभी कभी बन जाते है. यकीन मानिए यह गीत आपने प्रतिनिधि गीतों में से एक होगा. इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकारें. सादर 

 

Comment by Shyam Narain Verma on December 19, 2016 at 4:50pm
क्या बात है . हार्दिक बधाई ।
Comment by Samar kabeer on December 18, 2016 at 5:19pm
मोहतरमा प्रतिभा पाण्डेय जी आदाब,दादी की याद दिलाता बहुत सुंदर भावपूर्ण गीत लिखा है आपने जो मौसम के अनुकूल भी है, इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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