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सूर्य ने छाया को ठगा .......

नव गीत
सूर्य ने
छाया को ठगा |


काँपता थर.थर अँधेरा
कोहरे का है बसेरा
जागता अल्हड़ सवेरा
किरनों ने
दिया है दग़ा |


रोशनी का दीपकों से
दीपकों का बातियों से
बातियों का ज्योतियोँ से
नेह नाता
क्यों नहीं पगा |


छाँव झीनी काँपती सी
बाँह धूपिज थामती सी
ठाँव कोई ताकती सी
अब कौन है
किसका सगा

......आभा

प्रस्तुत  नव गीत  अप्रकाशित एवं मौलिक है .....आभा 

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on July 28, 2016 at 8:37am

वाह ! बहुत सुंदर भावपूर्ण नवगीत. बहुत-बहुत बधाई.सादर.

Comment by Abha saxena Doonwi on July 27, 2016 at 8:37am

आदरणीय  Shyam Narayan Verma जी बहुत बहुत  आभार ....आपकी  प्रतिक्रिया से  मेरा सृजन सफल हुआ ..ऐसे ही स्नेह भाव बनाये रखियेगा ...

Comment by Abha saxena Doonwi on July 27, 2016 at 8:36am

आदरणीय Sushil Sarna  जी बहुत बहुत  आभार ....आपकी  प्रतिक्रिया से  मेरा सृजन सफल हुआ ..ऐसे ही स्नेह भाव बनाये रखियेगा ...

Comment by Abha saxena Doonwi on July 27, 2016 at 8:35am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी बहुत बहुत  आभार ....आपकी  प्रतिक्रिया से  मेरा सृजन सफल हुआ ..ऐसे ही स्नेह भाव बनाये रखियेगा ...

Comment by Abha saxena Doonwi on July 27, 2016 at 8:34am

आदरणीय सुरेश कुमार जी बहुत बहुत  आभार ....आपकी  प्रतिक्रिया से  मेरा सृजन सफल हुआ ..ऐसे ही स्नेह भाव बनाये रखियेगा ...

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 26, 2016 at 8:13pm
आदरणीया आभा जी बहुत ही सुन्दर सृजन किया है, बधाई हो ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 26, 2016 at 5:36pm

आदरणीया आभा जी , प्रस्तुति के लिये हार्दिक बधाई , गीत की रचना अच्छी हुई है ।

Comment by Sushil Sarna on July 26, 2016 at 3:40pm

आदरणीया जी  इस  सुंदर और भावपूर्ण नव गीत के सृजन के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by Shyam Narain Verma on July 26, 2016 at 11:52am
बहुत सुंदर नवगीत...बहुत-बहुत बधाई

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