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babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-117
"हाइकूसघन पीरदस जन खाते हैं एक कमाता सेदोकाचिथड़े जूतेथिगड़े कपड़ों में तप्त दोपहरी में भूख मिटाने फाबड़ा तसला लेचल पड़ा अकेले तांकाबोझिल मनदर्द पलायन कानिहत्था हुआहताशा संग लिएविपदा से जूझता चोकावक्त के आगे निर्बल बन गयाडर निराशाघर करती जाती…"
Jul 12
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सरजी। "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"उम्दा रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सरजी। "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सरजी। "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"वर्तमान की ज्वलंत समस्या पर उम्दा रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सरजी। "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"देशभक्ति की भावना जाग्रत करती बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सरजी। "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"प्रदत्त विषय पर उम्दा रचना। बहुत-बहुत बधाई, सरजी। "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"बहुत-बहुत धन्यवाद  आदरणीय सरजी !"
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय सरजी! "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीय सरजी! "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीय सरजी। "
Jun 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"संवेदनशील रचना। बहुत-बहुत बधाई, आदरणीया अर्चना दी। "
Jun 29
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-63 (विषय: मातृभूमि)
"धरा के रक्षकसायंकाल घर में  रामू अपने बावा-दादी, मम्मी-पापा और बड़ी बहिन के साथ दूरदर्शन पर धारावाहिक तारक मेहता का चश्मा का आनंद उठा रहे था।विश्राम काल में रामू के बावाजी ने समाचार चैनल लगाया,तो खबर सुन-देख सभी के चेहरे पर शोक छा…"
Jun 29
Samar kabeer commented on babitagupta's blog post मेरे पिता (लेख)
"मुहतरमा बबीता गुप्ता जी, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Jun 24
babitagupta posted a blog post

मेरे पिता (लेख)

मेरे पितापिता शब्द स्वयं अपने आप में बजनदार होता हैं। हाथ की दसों उंगलियों की तरह हर पिता का व्यक्तित्व अलग होता हैं। पिता को परिभाषित किया जा सकता हैं, उपमानों से अलंकारित किया जा सकता हैं पर रेखांकित नही किया जा सकता।बस,उम्मीद की जा सकती हैं कि हमारे पिता बहुत अच्छे हैं, बस थोड़े-से ऐसे और होते। सभी बच्चों के पिता उनके हीरो होते हैं। ऐसे ही मेरे पिता मेरे किसी सुपरमेन से कम नहीं हैं, हरफनमौला हैं। बचपन से मैंने उनका सख्त चेहरा,कठोर अनुशासनबद्ध,जुझारूपन देखा हैं। मितभाषी हम सब के लिए पर…See More
Jun 21
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"बहुत-बहुत आभार आपका आदरणीय सरजी। "
May 31

Profile Information

Gender
Female
City State
chhattisgarh
Native Place
Bilaspur
Profession
Retired teacher
About me
Simplicity

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At 11:36pm on April 13, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीया बबिता गुप्ता जी बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ने का

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मेरे पिता (लेख)

मेरे पिता

पिता शब्द स्वयं अपने आप में बजनदार होता हैं। हाथ की दसों उंगलियों की तरह हर पिता का व्यक्तित्व अलग होता हैं। पिता को परिभाषित किया जा सकता हैं, उपमानों से अलंकारित किया जा सकता हैं पर रेखांकित नही किया जा सकता।बस,उम्मीद की जा सकती हैं कि हमारे पिता बहुत अच्छे हैं, बस थोड़े-से ऐसे और होते। सभी बच्चों के पिता उनके हीरो होते हैं। ऐसे ही मेरे पिता मेरे किसी सुपरमेन से कम नहीं हैं, हरफनमौला हैं। बचपन से मैंने उनका सख्त चेहरा,कठोर अनुशासनबद्ध,जुझारूपन देखा हैं। मितभाषी हम सब के…

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Posted on June 21, 2020 at 3:03pm — 1 Comment

फूल

फूल-सी सुकोमल,सुकुमारी

कौन-सा फूल तेरी बगिया की

न्यारी-प्यारी माँ-बाबा की दुलारी

मुस्कराती ,बाबा फूले ना समाते

फूल-से झङते माँ होले-से कहती

पर दादी झिङकती-फूल कोई-सा होवे

पर सिर पर ना ,चरणों में चढाये जावे

उस समय कोमल मन को समझ ना आई

जब किसी के घर गुलदान की शोभा बनी

तब बात समझ आई

नकारा,छटपटाई,महकना चाहती थी

टूटकर अस्तित्वहीन नहीं होना था

पर असफल रही,दल-दल छितर-बितर गया

सोचती,मैं फूल तो हूँ

चंपा,चमेली,चांदनी,पारिजात नहीं

गुलाब…

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Posted on April 21, 2020 at 4:32pm

जीवन का कर्फ्यू

जीवन का कर्फ्यू

रोजमर्रा की तरह टहलते हुये रामलाल उद्यान में गोपाल से मिला तो उसके चेहरे की झाईयां से झलकती खुशी कुछ और ही बयां कर रही थी।इससे पहले मैं कुछ पूछता कि उसने कहा, 'यार,कल जैसा दिन गुजारे जमाना हो गया।'

'पर यार कल तो कर्फ्यू लगा था।न किसी से मिलना-जुलना हुआ।कितना बोरियत भरा दिन था?'

'तेरे लिए था।पर इसने मेरी जिन्दगी के कर्फ्यू को हटा दिया।'

'कुछ समझा नही?'प्रश्न भरी निगाह से रामलाल ने गोपाल की तरफ देखकर कहा।

गोपाल ने पास पङी बेंच पर उससे बैठने का इशारा…

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Posted on March 22, 2020 at 11:33pm — 2 Comments

परिचय [लघु कथा ]

परिचय

मेला प्रांगण में आयोजित बारहवाँ साहित्य सम्मेलन में देशभर के साहित्यकारों का जमावड़ा लगा हुआ था,जिसमें माननीय राज्यपाल के करकमलों से पुस्तक का विमोचन किया जाना था.

आगंतुकों में शहर के प्रतिष्ठित,मनोहर बाबू भी विशिष्ठजन की पंक्ति मंं विराजमान थे.शीघ्र ही मंच पर राज्यपाल की उपस्थित से सन्नाटा खिंच गया.औपचारिकताओं के पश्चात,जिस लेखक की किताब ‘मेरा परिचय’का अनुमोदन किया जाना था,उसे संबोधित कर मंच पर आने का आग्रह किया गया.तो सभी की उत्सुकता में एकटक निगाहें मंचासीन होने वाले के…

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Posted on March 4, 2019 at 10:45pm — 7 Comments

 
 
 

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