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"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,

सादर नमन।
.
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
प्रस्तुत है.....
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132
विषय : विषय मुक्त
अवधि : 25-03-2026 से 31-03-2026
.
अति आवश्यक सूचना:-
1. सदस्यगण आयोजन अवधि के दौरान अपनी केवल एक लघुकथा पोस्ट कर सकते हैं।
2. रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना/ टिप्पणियाँ केवल देवनागरी फॉण्ट में टाइप कर, लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड/नॉन इटेलिक टेक्स्ट में ही पोस्ट करें।
3. टिप्पणियाँ केवल "रनिंग टेक्स्ट" में ही लिखें, 10-15 शब्द की टिप्पणी को 3-4 पंक्तियों में विभक्त न करें। ऐसा करने से आयोजन के पन्नों की संख्या अनावश्यक रूप में बढ़ जाती है तथा "पेज जम्पिंग" की समस्या आ जाती है। 
4. एक-दो शब्द की चलताऊ टिप्पणी देने से गुरेज़ करें। ऐसी हल्की टिप्पणी मंच और रचनाकार का अपमान मानी जाती है।आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है, किन्तु बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पाए इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है। देखा गया कि कई साथी अपनी रचना पोस्ट करने के बाद गायब हो जाते हैं, या केवल अपनी रचना के आस पास ही मंडराते रहते हैंI कुछेक साथी दूसरों की रचना पर टिप्पणी करना तो दूर वे अपनी रचना पर आई टिप्पणियों तक की पावती देने तक से गुरेज़ करते हैंI ऐसा रवैया कतई ठीक नहींI यह रचनाकार के साथ-साथ टिप्पणीकर्ता का भी अपमान हैI
5. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति तथा गलत थ्रेड में पोस्ट हुई रचना/टिप्पणी को बिना कोई कारण बताये हटाया जा सकता है। यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
6. रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका, अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल/स्माइली आदि लिखने/लगाने की आवश्यकता नहीं है।
7. प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार "मौलिक व अप्रकाशित" अवश्य लिखें।
8. आयोजन से दौरान रचना में संशोधन हेतु कोई अनुरोध स्वीकार्य न होगा। रचनाओं का संकलन आने के बाद ही संशोधन हेतु अनुरोध करें। 
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मंच संचालक
योगराज प्रभाकर
(प्रधान संपादक)

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स्वागतम

शब्द बाण                                                               

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संगीत संध्या में दो हजार कुर्सियाँ श्रोताओं से भरी हुई थीं। संगीत में विशेष रुचि न होते हुए भी आयोजकों के आग्रह पर एक हजार सहयोग राशि देकर गंगाराम प्रथम पंक्ति में विराजमान थे।

तीस मिनट देर से मंच पर आते ही एकमात्र प्रौढ़ गायिका ने अलाप लेना प्रारंभ किया। उसकी कुरूपता से गंगाराम कुछ निराश हुए उस पर दस मिनट के अलाप के बाद हिन्दी अरबी फारसी शब्दों के प्रयोग से जब उसने कर्कश स्वर में गाना प्रारंभ किया तो लगा कि कहाँ फँस गए।

तीस मिनट सुनने के बाद बेचैन गंगाराम बाजू में बैठे सज्जन से पूछ बैठे - “बड़े दांत भोंडी नाक और समोसे जैसे मुखड़े वाली ये मोटी काली महिला कौन है ?”

सज्जन सहज भाव से बोले- “ जिसकी इतनी तारीफ की, वो मेरी धर्मपत्नी है।"

गंगाराम की दशा दयनीय हो गई। शब्द बाण वापस ले नहीं सकते। दो मिनट गायिका को ताकते रहे, फिर उस अभागे सज्जन से बोले- “ गरम समोसे के साथ गीत संगीत का आनंद लेंगे, मैं लेकर आता हूँ।”

सज्जन मुस्कुराते रहे, वे समझ गये कि न समोसा आएगा न ही वो बेचारा बेचैन मानव।

===========

( मौलिक अप्रकाशित )

अनुरोध - कर्कश स्वर को पंचम स्वर पढ़ें ...... धन्यवाद 

लघुकथा पर अच्छा प्रयास हुआ है अखिलेश भाई। पढ़ने में रोचक तो है।

विशेष टिप्पणी तो इस विधा के जानकार ही कर पाएंगें। सो उनका इंतज़ार करते है। 

बहरहाल, पनाह बधाई। 

सादर 

सादर नमस्कार मंच। लतीफ़ेनुमा किंतु बहुत ही तंजदार रचना के साथ विषय मुक्त लघुकथा गोष्ठी के नव प्रयोग में सहभागिता हेतु हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी। तंज है संगीत में रुचि न होने वाले लोगों को सभा में दर्शक-श्रोता दीर्घा में स्थान देने पर , वो भी अच्छी खासी सहयोग राशि के एवज में। ऐसे लोगों में ऐसे भी होते हैं, जो कलाकार की काया पर ग़ौर करते हैं, प्रतिभा और सभा के अनुशासन पर नहीं।  तंज है ऐसे अभद्र शब्द बाणों से अपना ही परिचय देने वाले दर्शक और श्रोता पर। तंज है व्यवस्थापक पर।  समापन वाक्य में लेखकीय प्रवेश लगता है। अर्थात समापन वाक्य सही नहीं है लघुकथा विधा के समापन विधान अनुसार। समापन वाक्य जवाबी तंजदार विचारोत्तेजक संवाद से हो, तो बेहतर।  नकारात्मक शब्द बाण का जवाब सकारात्मक तीखे शब्द बाण से दिया जा सकता है लघुकथा के तेवर हेतु। तब बढ़िया शीर्षक की सार्थकता भी अधिक हो जायेगी।अन्य सहभागियों की रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी। मैं भी प्रयासरत हूं।

आदरणीय शेख शहजादजी

शास्त्रीय गीत संगीत में रुचि न रखने वाले से अधिकतम सहयोग राशि (चंदा ) जबरदस्ती  लोगे और उसकी पसंद का कुछ भी न हो तो अपनी भड़ास कहाँ निकालेगा। और सबसे बड़ी बात गंगारामजी ने  जो भी कहा  उसमें सच्चाई है। इसीलिए गायिका के पति भी मुस्कुराते रहे। शास्त्रीय राग आधारित कुछ फिल्मी गीत होता तो शायद सहन भी कर लेते। पूरी कथा गंगाराम के नजरिये से लिखी गई है वही नायक है। उसके शब्दों के कारण ही शीर्षक सार्थक हुआ है।  

जी, शुक्रिया।

आदरणीय अखिलेश जी

स्वयं के प्रचार प्रसार के लिए इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रमों का चलन साहित्य और कला के क्षेत्रों में आम हो रहा है। इस पर आपने खूब कलम चलाई है। व्यंग्यात्मक शैली लिए आपकी रचना रोचक है। हार्दिक बधाई। 

हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों में आम बात है।

सहयोग राशि किसी अधिकारी के दबाव में दे भी देते हैं तो वे समय का महत्व जानते हैं और आयोजन से दूर ही रहते हैं । 

आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा लिखी है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर 

आदरणीय अशोक भाईजी

धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।

पगले यहीं के (लघुकथा): 
सरकारी योजनाओं के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालयों की व्यवस्थाएं भी बच्चों के अनुकूल पर्यावरण में उचित व्यवस्थाओं के साथ की जा चुकी थीं। ऐसा ही एक विद्यालय कुछ विद्यार्थियों के साथ चल रहा था या यूं कहें कि चलाया जा रहा था अच्छी खासी विद्यार्थी संख्या के प्रमाण जुटाते और बताते हुए।
विद्यार्थी घर छोड़ समय से पहले ही विद्यालय पहुंचकर शिक्षकों की प्रतीक्षा करते थे। आज जब बच्चे विद्यालय पहुंचे, तो मुख्य द्वार पर ताला लगा हुआ था। 
सुखिया साथियों से बोली, "मतलब आज भी पढ़ाई नहीं होगी। चलो खाना पकाने वाली बाई से स्कूल की दूसरी चाबी लेकर ताला खोलते हैं और कमरे में बैठ कर पढ़ाई करते हैं परसों की तरह।" 
"हॉं, एकाध घंटे में कोई न कोई मासाब आ ही जायेंगे हाज़री लगाने!" कन्हैया ने पीठ पर बस्ता लटकाते हुए कहा।
"लेकिन आज हम ताला नहीं खोलेंगे। यहीं खेलेंगे बाहर। चलो खो-खो खेलते हैं या दौड़ लगाते हैं!" लक्ष्यदीप ने अपनी पगड़ी सही करते हुए कहा। और कुछ विद्यार्थी दौड़ने लगे एक-दूसरे के पीछे।
"लेकिन हमें तो भूख लग रही है। पहले रसोई में चलो। मध्याह्न भोजन अभी कर लेते हैं रसोई वाली चाची से कहकर।" नन्ही मुन्नी ने अपने दोनों हाथों से पेट पकड़कर कहा।
"पर पगली अभी कुछ पका हो, तब न! बासा खाना खायेगी क्या?" कन्हैया ने ठहाका लगा कर कहा।
तभी मोटरसाइकिल से विद्यालय का चपरासी आ गया और बच्चों को देखकर चिल्लाया, "धूप में क्यों खेल रहे हो? आज ताला क्यों नहीं खोला? झाड़ू तो लगा देते अब तक एक-दो कमरों में!"
सभी बच्चे एक-दूसरे के मुंह ताकते रह गये।
"लो बेटा, अब लेना मज़े मासाब की सज़ा में इंटरवल में!" एक विद्यार्थी ने  धीमे स्वर में दूसरे से कहा।
(मौलिक व अप्रकाशित)

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