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नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   
जिस-जिस की सामर्थ्य रही है
धौंस उसी की
एक सदा से
 
एक कहावत रही चलन में
भैंस उसीकी जिसकी लाठी
मनमर्जी थोपी जाती है
नहीं चली तो तोड़ें काठी
 
अहंकार मद भरे विचारों
उड़ें हवा में
वे गर्दा से ..
 
हठ में अड़ना, जबरन भिड़ना
और झूठ रच मन की करना
निर्बल अबलों या नन्हों में
नाहक वीर बने घुस लड़ना
 
मद में ऐंठे गरमी झोंकें
लफ्फाजी भी
यदा-कदा से
 
खरबूजे का मीठा बाना
चक्कू से छिलता-कटता है
ऐसा ही कर देते उसकी
जो भी अपनों से बँटता है
 
काटे बाँटें वे मारे हैं
धमक बना कर
घृणित-अदा से
***
मौलिक और अप्रकाशित 

 

Views: 36

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' 5 hours ago

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर और समसामयिक नवगीत रचा है आपने। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on Tuesday

 

प्रस्तुत नवगीत को आपसे मिला उत्साहवर्द्धन हमें प्रयासरत रखेगा, आदरणीय अशोक भाईजी 

हार्दिक धन्यवाद. 

Comment by Ashok Kumar Raktale on Sunday

आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, नवगीत का पूरा निचोड़ शीर्षक में आ गया है. जहाँ भी जिसका ज़ोर होता है वह उसका दुरुपयोग करने से नहीं चूकता है. सच-झूठ सभी कुछ उसके लिए गौण हो जाते हैं.  बहुत सुन्दर और सर्वकालिक अपनी सार्थकता  सिद्ध करने वाला यह गीत रचा है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर 

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