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भादों की बारिश
(लघु कविता)
***************

लाँघ कर पर्वतमालाएं
पार कर
सागर की सर्पीली लहरें
मैदानों में दौड़ लगा
थकी हुई-सी
धीरे-धीरे कदम बढ़ाती
आ जाती है
बिना आहट किए
यह बूढ़ी
भादों की बारिश।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 30, 2025 at 12:18pm

आदरणीय सुरेश कल्याण जी, आपकी लघुकविता का मामला समझ में नहीं आ रहा. आपकी पिछ्ली रचना पर भी मैंने अपने विचार रखे थे. और फिर, भावनाओं को शाब्दिक करने में देखिएगा, शब्द अपने विशेषणॊं के बोझ से न दब जाएँ  भादों की बारिश बूढ़ी हो तो गयी तो कैसे? यदि उसका होना सनातन है, बना हुआ है, तो सारी प्रकृति ही बूढ़ी हुई न ? झबकि प्रकृति नित नवीनता का वरण करती है.

बहरहाल, आपके सारस्वत प्रयास के लिए शुभकामनाएँ. 

शुभातिशुभ

 

Comment by Chetan Prakash on August 26, 2025 at 8:40am
  • यह लघु कविता नहींहै। हाँ, क्षणिका हो सकती थी, जो नहीं हो पाई !

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