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कुर्सी को जानों -----डॉ o विजय शंकर

कुर्सी को जानों
कुर्सी को पहचानों ,
कुर्सी है तो जीवन है, जान है.
कुर्सी है तो भोंडापन भी ज्ञान है ,
अन्यथा क्या ज्ञान है, क्या विज्ञान है ,
डिग्रियों के लिए कूड़ेदान है।
कुर्सी है तो आस है ,
अपना चतुर्दिश विकास है |

तख़्त उलटते रहे होंगें ,
सिंहासन डोलते रहे होंगें ,
कुर्सी न उलटती है, न डोलती है ,
न उसे कोई ऐसा ख़तरा होता है ,
हाँ , कुर्सी पर जो बैठा हो
वो औरों के लिए जरूर ख़तरा होता है |
कोई कहता है ताक़त बन्दूक से आती है,
कोई कहता है ताक़त तोप से आती है ,
हमने देखा है , ताक़त कुर्सी से आती है,
कुर्सी पर न हो तो शेर भी कमजोर होता है ,
कुर्सी चढ़े तो कुछ देर चूहा भी शमशेर होता है |

ये कुर्सी - सभ्यता है ,
कुर्सी है तो सभ्यता है,
शान है, उत्थान , नाम है,
नाम के आगे पीछे महान है ,
वरना दुनियाँ बड़ी बेईमान है ,
आपकी कोई नहीं पहचान है |
एक बार कुर्सी से हट कर दुनियाँ देखिये ,
बगैर कुर्सीवालों के बीच जाइए और देखिये ,
एक अलग ही दुनियाँ नज़र आती है ,
कुर्सी कुर्सी हंसती है ,चिढ़ाती है,
प्रगति के हर कदम पे अड़ंगे लगाती है,
बैठने वालों के जरिये से कुर्सी ,
अलग अलग तरह की आवाजें निकालती है.
कुछ चढ़ा दो , तो , चढ़ावे के हिसाब से पुचकारती है |
तरस आता है कुर्सी पर बैठे लोगों पर ,
कुर्सी आदमी को इस तरह गुलाम बनाती है।
इस कदर गुलाम बनाती है.
औकात भुलाती है, औकात से गिराती है ,
खुद कभी नहीं गिरती , आदमी को रोज गिराती है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on February 9, 2015 at 11:35pm
हम पद से , ओहदे से आदमी को जानते हैं,
आदमी को जानते हुए पद और ओहदे नहीं देते ,
इसीलिये ओहदा जाते ही आदमी कहीं नहीं रहता ,
कहीं कहीं आदमी लोग कुर्सी का मान बढ़ाते हैं ,
हम कुर्सी से आदमी का मान बढ़ाते हैं ,
कुर्सी आदमी से बड़ी है ,
रचना को स्वीकृति प्रदान करने एवं आपकी बधाई के लिए ह्रदय से आभार प्रिय मिथिलेश वामनकर जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 9, 2015 at 11:11pm

खूब कहा कुरसी का किस्सा आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, हार्दिक बधाई 

ये कुर्सी - सभ्यता है ,
कुर्सी है तो सभ्यता है,
 नाम है, शान है, उत्थान है 
नाम के आगे पीछे महान है ,
वरना दुनियाँ बड़ी बेईमान है ,
आपकी नहीं कोई पहचान है |......... दमदार पंक्तियाँ 

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 9, 2015 at 10:49pm
सबसे शक्तिशाली कुर्सी ही है, सत्य है, पर हमारा और हम जैसों का सत्य है. केवल हम जैसों का। क्योंकि जनतंत्र में इससे बड़ा विरोधाभास् और क्या हो सकता है. इसी से लगता है कि हम अभी भी मध्य युग में हैं जहां शक्ति सबकुछ नियंत्रित करती है, मनमानी करती है और स्वयं किसी भी नियंत्रण से बाहर होती है, निरंकुश होती है। रचना को स्वीकार करने के लिए बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद, आदरणीय इंजी O गणेश जी, बागी जी , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 9, 2015 at 10:39pm
आदरनीय सोमेश जी, रचना को स्वीकारने के लिए ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद, सादर।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 9, 2015 at 10:21pm

सबसे शक्तिशाली कुर्सी ही है....इस कुर्सी महिमा हेतु बधाई आदरणीय डॉ विजय शंकर जी.

Comment by somesh kumar on February 9, 2015 at 10:08pm

कुर्सी महिमा और उसके चरित्र का सुंदर वर्णन |बधाई सर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 9, 2015 at 3:44pm

कुर्सी है तो आस है ,
अपना चतुर्दिश विकास है.....बहुत बढ़िया गुणगान. बधाई स्वीकारें आदरणीय डा. विजय जी.

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