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ग़ज़ल नूर की- सँभाले थे तूफ़ाँ उमड़ते हुए

सँभाले थे तूफ़ाँ उमड़ते हुए
मुहब्बत से अपनी बिछड़ते हुए.
.
समुन्दर नमाज़ी लगे है कोई
जबीं साहिलों पे रगड़ते हुए.
.
हिमालय सा मानों कोई बोझ है
लगा शर्म से मुझ को गड़ते हुए.
.
“हर इक साँस ने”; उन से कहना ज़रूर  
उन्हें ही पुकारा उखड़ते हुए.  
.
हराना ज़माने को मुश्किल न था  
मगर ख़ुद से हारा मैं लड़ते  हुए.
.
ज़रा देर को शम्स डूबा जो “नूर”
मिले मुझ को जुगनू अकड़ते हुए.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित  

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Comment

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Comment by राज़ नवादवी on October 28, 2018 at 3:22pm

आदरणीय नीलेश नूर साहब, आदाब. बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ......ख़ासकर ये दो शेर:

हराना ज़माने को मुश्किल न था  
मगर ख़ुद से हारा मैं लड़ते  हुए.
.
ज़रा देर को शम्स डूबा जो “नूर”
मिले मुझ को जुगनू अकड़ते हुए.

रचना के साथ ग़ज़ल की बह्र/ वज़न भी लिख दें तो बेहतर होगा जो मेरे ख़याल से १२२ १२२ १२२ १२ है. सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 28, 2018 at 1:33pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

हराना ज़माने को मुश्किल न था  
मगर ख़ुद से हारा मैं लड़ते  हुए.
.

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