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गजल- जहाँ ईमान का पौधा नहीं है

मापनी 1222 1222122

जहाँ ईमान का पौधा नहीं है

यक़ीनन बाग वह मेरा नहीं है

 

इबादतगाह में है शोर केवल

खुदा का जिक्र अब होता नहीं है

 

भले फूलों सा’ कोमल हो न सच, पर

किसी की राह का काँटा नहीं है  

 

भलाई कर भुला देना है मुश्किल

सभी के बस का' ये बूता नहीं है

 

किसी की बात को दिल पर न ले जो

कभी अपनों को’ वो खोता नहीं है

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by Neelam Upadhyaya on July 27, 2018 at 12:33pm

आदरणीय बसंत कुमार जी, बेहतरीन रचना के  लिए हार्दिक  बधाई । 

 
 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 26, 2018 at 4:10pm

हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी।बेहतरीन गज़ल।

इबादतगाह में है शोर केवल

खुदा का जिक्र अब होता नहीं है

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 26, 2018 at 1:14pm

आदरणीय समर कबीर जी, सादर नमस्कार, आपका आशीष मिला गजल को, मन हर्षित है, लाजबाब अनुकरणीय सुझाव आपके. यूँ ही स्नेह बनाये रखें, सादर नमन 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 26, 2018 at 1:12pm

आदरणीया babitagupta जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by Samar kabeer on July 26, 2018 at 11:31am

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

किसी का राह का काँटा नहीं है  

इस मिसरे में 'का' को "की" कर लें ।

भलाई कर भुला देना न मुश्किल

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'भलाई कर भुला देना है मुश्किल'

Comment by babitagupta on July 25, 2018 at 7:17pm

बेहतरीन रचना द्वारा नैतिक मूल्यों का इन्सान में आईना दिखाना,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

कृपया ध्यान दे...

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