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लिखा बेहतर नहीं जाता- गजल

1222  1222 1222 1222

 

शिकायत है बहुत खुद से कि मैं क्यों कर नहीं जाता  

मुझे जिससे मुहब्बत है, उसी के घर नहीं जाता

 

अगर मिलना है’ उससे तो, तुम्हें जाना पड़ेगा खुद

चला करता है दरिया ही, कहीं सागर नहीं जाता

 

मधुर यादों के उपवन में, मैं खोया इस तरह से हूँ,  

कि गम का एक भी झौंका, मुझे छूकर नहीं जाता  

 

कहाँ कैसे मिलेगा वो, समझता ही नहीं ये मन

भटकता खूब है बाहर, मगर भीतर नहीं जाता

 

कलम अपनी उठा कर हम, कभी कुछ भी लिखें लेकिन          

न हो यदि दर्द दिल में तो, लिखा बेहतर नहीं जाता

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on June 11, 2018 at 4:47pm
बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल ....हार्दिक बधाई ! 

कृपया ध्यान दे...

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