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ज़िंदगी से दूर कब तक.....संतोष

अरकान:फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन

ज़िन्दगी से दूर कब तक जाओगे,
किस तरह सच्चाई को झुटलाओगे।।

सादगी इतनी मियाँ अच्छी नहीं,
ज़िन्दगी में रोज़ धोका खाओगे।।

तल्ख़ यादें दिल से मिटती ही नहीं,
ज़िन्दगी में चैन कैसे पाओगे।।

तुम ग़मों को मात देना सीख लो,
अश्क पीकर कब तलक ग़म खाओगे।। 

अपनी कमज़ोरी को ज़ाहिर मत करो,
वरना हर सौदे में घाटा खाओगे।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

#संतोष_खिरवड़कर

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Comment by santosh khirwadkar on March 14, 2018 at 8:21pm

हृदय से धन्यवाद आदरणीय अजय जी !!!

Comment by Ajay Tiwari on March 14, 2018 at 7:52pm

'सादगी इतनी मियाँ अच्छी नहीं' लेकिन आपके शेरों की सादगी बहुत प्यारी है.

हार्दिक बधाई. आदरणीय संतोष जी.  

Comment by santosh khirwadkar on March 14, 2018 at 5:09pm

धन्यवाद,आदरणीय धामी जी !!!!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2018 at 1:28pm

आ.भाई संतोष जी सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by santosh khirwadkar on March 14, 2018 at 1:14pm

प्रणाम आदरणीय समर साहब !!!

धन्यवाद! 

Comment by Samar kabeer on March 14, 2018 at 11:49am

जनाब संतोष जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

वैसे,'मुस्काओगे'का प्रयोग भी ग़लत नहीं कहा जा सकता,क्योंकि 'मुस्कान',मुस्काई, कह सकते हैं तो मेरे ख़याल से 'मुस्काओगे'भी ग़लत नहीं,जाय मुखर्जी की एक फ़िल्म का नाम है'एक कली मुस्काई'।

Comment by santosh khirwadkar on March 13, 2018 at 10:04pm

आदरनीय भाई श्री निलेश जी ..उस शे’र को पुनः संशोधित कर कुछ इस तरह पुनः ग़ज़ल में एडिट किया है कि...

तुम ग़मों को मात देना सीख लो,

अश्क़ पीकर कब तलक ग़म खाओगे।।

उचित मार्गदर्शन अपेक्षित!!

Comment by santosh khirwadkar on March 13, 2018 at 9:39pm

धन्यवाद आदरणीय महाजन साहब!!!

Comment by santosh khirwadkar on March 13, 2018 at 9:38pm

शुक्रिया भाई श्री निलेश जी !!

Comment by santosh khirwadkar on March 13, 2018 at 9:37pm

बहुत शुक्रिया आदरणीय आरिफ़ साहब!!!

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