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बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,
विद्यालय का प्यारा आॅंगन,
साथी-संगियों से वह अनबन,
गुरू के भय का अद्भुत कंपन,
इन्हीं विचारों के घेरे में,
मन को अपने सेंक रहा हूॅं,
बचपन को फिर देख रहा हॅूं,
निष्छल मन का था सागर,
पर्वत-नदियों में था घर,
उछल-कूद कर जाता था मैं,
गलती पर डर जाता था मैं,
लेकिन आज यहाॅं पर फिर से,
गल्तियों का आलेख रहा हूॅं,
बचपन को फिर देख रहा हॅूं,
चिर लक्ष्य का स्वप्न संजोया,
भावों का मैं हार पिरोया,
मेहनत की फिर कड़ी बनाई,
उस पर मैंने दौड़ लगाई,
वह बचपन का महासमर था,
अब पचपन को देख रहा हूॅं।


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Manoj kumar shrivastava on December 2, 2017 at 9:25pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी, आपका कोटिशः आभार। आपसे सतत मार्गदर्शन की अपेक्षा है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 2, 2017 at 8:01pm

अच्छी रचना मनोज कुमार जी बहुत बहुत बधाई 

Comment by Manoj kumar shrivastava on December 2, 2017 at 8:43am
कोटिशः आभार स्वीकारिये आदरणीय मुसाफिर जी।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 1, 2017 at 1:39pm
आ. भाई मनोज जी. अच्छी रचना हुई है । बधाई ।
Comment by Manoj kumar shrivastava on November 28, 2017 at 5:36pm
आदरणीय श्री मोहम्मद आरिफ जी,सादर अभिवादन!कविता पर समर्थन हेतु आपका कोटिशः आभार, आपका स्नेह बना रहे।
Comment by Manoj kumar shrivastava on November 28, 2017 at 5:35pm
आदरणीय दादा श्री समर कबीर जी प्रणाम। उत्साहवर्धन हेतु कोटिशः आभार स्वीकार करें।
Comment by Samar kabeer on November 28, 2017 at 5:30pm
जनाब मनोज कुमार जी आदाब,अच्छी रचना है,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on November 28, 2017 at 2:03pm
आदरणीय मनोज जी आदाब,
बचपन की मधुर स्मृतियों से आच्छादित बेहतरीन कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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