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ग़ज़ल: अंगारो से प्रीत निभाया करता हूँ

22 22 22 22 22 2
अंगारो से प्रीत निभाया करता हूँ ।
ख्वाब जलाकर रोज़ उजाला करता हूँ।।

एक झलक की ख्वाहिश लेकर मुद्दत से ।
मैं बादल में चांद निहारा करता हूँ ।।

एक लहर आती है सब बह जाता है ।
रेत पे जब जब महल बनाया करता हूँ ।।

शेर मेरे आबाद हुए एहसान तेरा ।
मैं ग़ज़लों में अक्स उतारा करता हूँ ।।


दर्द कहीं जाहिर न हो जाये मुझसे ।
हंस कर ग़म का राज छुपाया करता हूँ ।।

पूछ न मुझसे आज मुहब्बत की बातें ।
याद में तेरे वक्त गुजारा करता हूँ ।।

सब कुछ सुनकर बात वही वो टाल रहा ।
जिन बातों पर रोज इशारा करता हूँ ।।


फिर रिश्तों के बीच मिली हैं दीवारें ।
जिनको मैं दिन रात गिराया करता हूँ।।

मेरी उल्फ़त पर हँसते हैं लोग यहां ।
आसमान की हसरत पाला करता हूं ।।

अक्सर नंगे हो जाते हैं पाव मेरे ।
जब चादर से पांव निकाला करता हूँ ।।

तूफानों में साथ छोड़ उड़ जाएंगे ।
जिन पत्तों के साथ बसेरा करता हूँ ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Afroz 'sahr' on November 7, 2017 at 11:52pm
आदरणीय नवीन मणि जी आदाब आपने तीसरे शेर के ऊला मिसरे की तक़्तीअ की है । इसमें एब ए तनाफ़ुर है जब की इसी शेर का सानी मिसरा बह्र में नहीं है । देखिएगा,,सादर,,,
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 7, 2017 at 10:12pm
आ0अफरोज साहब एक लहर आती है सब बह जाता है । एक 21 लहर 12 यहां 2112 है ।इस तरह से लिखा है ।
Comment by Afroz 'sahr' on November 7, 2017 at 1:49pm
आदरणीय नवीन मणी जी इस रचना पर बधाई आपको।
तीसरेशेर के ऊला मिसरे में एब ए तनाफ़ुर है। तीसरे शेर का सानी मिसरा अर्कान के मुताबिक बह्र में नहीं है।
छठे शेर का सानी मिसरा "यादमें तेरे वक्त गुज़ारा करता हूँ"
में "याद" स्त्रीलिंग है। "याद में तेरी वक्त गुज़ारा करता हूँ"
सही रहेगा,,

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