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अरकान:-फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़्इलातुन फेलुन

है कहाँ, कौन है,कैसा वो नज़र आता है
ख़ुद में कम मुझ में ज़ियादा वो नज़र आता है

क्या तअल्लुक़ है मेरा उससे बताऊँ कैसे
हर दुआ में मुझे चहरा वो नज़र आता है

तिश्नगी जब मुझे दीदार की तड़पाये तो
ऐसे हालात में दरया वो नज़र आता है

घेर लेते हैं मुझे जब भी अँधेरे ग़म के
मेरा हमदर्द अकेला वो नज़र आता है

तुमने पूछा कभी'संतोष'से जाकर यारो
किसलिये भीड़ में तन्हा वो नज़र आता है
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by santosh khirwadkar on October 15, 2017 at 7:34pm
हृदय से धन्यवाद आदरणीय सौरभ जी ....

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 15, 2017 at 7:31pm

इस पटल पर आपकी कोई प्रस्तुति पहली बार देख रहा हूँ. आश्वस्तिकारी इस प्रस्तुति के लिएहार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएँ 

ग़ज़ल पर आपका अभ्यास सतत बना रहे. 

शुभ-शुभ

Comment by santosh khirwadkar on October 15, 2017 at 9:38am
शुक्रिया आदरणीय अजय जी ...
Comment by Ajay Tiwari on October 15, 2017 at 9:29am

आदरणीय संतोष जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं.
सादर

Comment by santosh khirwadkar on October 12, 2017 at 6:12pm
प्रणाम आदरणीय समर साहब, तहेदिल से शुक्रिया!!’
Comment by santosh khirwadkar on October 12, 2017 at 6:11pm
आदरणीय निलेश जी , शुक्रिया!!!
आप के इस बारीक निखार पर अवश्य ही सुधार का प्रयत्न करूँगा!!
Comment by Samar kabeer on October 12, 2017 at 5:23pm
जनाब संतोष जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 12, 2017 at 12:12pm

आ. संतोष जी 
अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
मेरा हमदर्द अकेला वो नज़र आता है में वो के साथ तकरार हो रही है 
.
घेर लेते हैं मुझे जब भी अँधेरे ग़म के
साथ हमदर्द अकेला वो नज़र आता है... अब देखिये 
सादर 

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