For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा // डॉ० प्राची

शुचित यज्ञ सी
मन प्राणों में घोल सुगन्धि,
आँगन में त्यौहार सरीखे मेरे पापा...

थाम अँगुलियाँ जिनकी
हर उलझी पगडण्डी लगी सरल सी,
ज़मी किरचियाँ व्यवहारों की
पिघल हृदय से बहीं तरल सी,

सबकी ख़ातिर बोए पग-पग
गुलमोहर और छाँटे कीकर,
सौंपी सबको ख़ुशियों की प्याली
ख़ुद पी हर व्यथा गरल सी,

फिर भी आँखों में बाँधे
हर वक़्त सवेरा,
अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा....

गुड्डे-गुड़ियाँ, टिक-टिक घोड़े
और अनेकों परी कथाऐं,
सब में कितनी चतुराई से
पापा भरते थे शिक्षाऐं,

मेरे बिन बोले ही
मेरे अंतर्द्वंद्व पढ़ें जस के तस,
"ख़ुद को साधो सबसे पहले"
बात यही अक्सर समझाऐं,

मुझको दिए झरोखे
और खुले दरवाज़े ,
पर अभेद्य दीवार सरीखे मेरे पापा....

हर ग़लती हर नादानी की
बिन माँगे ही माफ़ी दे कर,
खोमोशी से हर चिंतन को
ले चलते हैं उचित डगर पर,

रीते हाथों में ना जाने
सपने कब गपचुप बोते हैं,
फिर सच्चाई से जीवन का
समझाते हैं अक्षर-अक्षर,

सर पर हाथ फेर
कर देते पावन अंतस,
ऐसी निर्मल धार सरीखे मेरे पापा....

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 696

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 19, 2017 at 1:14am
जी सौरभ जी बिल्कुल
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 15, 2017 at 9:26pm
बहुत ही उत्तम गीत हुआ आदरणीया..सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 15, 2017 at 7:28pm

आपकी दोनों कविताएँ पढ़ गया, आदरणीया प्राची जी.  भाव एक होते हुए भी दोनों कविताएँ प्रच्छन्न हैं. 

इन भावमय प्रस्तुतियों के लिए हार्दिक बधाइयाँ .. बहुत खूब ! 

’करी’ का प्रयोग आप न किया करें. क्योंकि आप हिन्दी को एक भाषा के तौर पर अच्छे से जानती हैं. साथ ही, ’अनेकों’ का प्रयोग तो आप एकदम-से न किया करें, क्योंकि आप हिन्दी को एक भाषा के तौर बहुत अच्छे से जानती हैं. 

सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 12, 2017 at 11:19pm
इस गीत को कुछ इस तरह परिवर्तित किया है

शुचित यज्ञ सी
मन प्राणों में घोल सुगन्धि,
आँगन में त्यौहार सरीखे मेरे पापा...

थाम अँगुलियाँ जिनकी
हर उलझी पगडण्डी लगी सरल सी,
ज़मी किरचियाँ व्यवहारों की
पिघल हृदय से बहीं तरल सी,

सबकी ख़ातिर बोए पग-पग
गुलमोहर और छाँटे कीकर,
सौंपी सबको ख़ुशियों की प्याली
ख़ुद पी हर व्यथा गरल सी,

फिर भी आँखों में बाँधे
हर वक़्त सवेरा,
अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा....

गुड्डे-गुड़ियाँ, टिक-टिक घोड़े
और अनेकों परी कथाऐं,
सब में कितनी चतुराई से
पापा भरते थे शिक्षाऐं,

मेरे बिन बोले ही
मेरे अंतर्द्वंद्व पढ़ें जस के तस,
"ख़ुद को साधो सबसे पहले"
बात यही अक्सर समझाऐं,

मुझको दिए झरोखे
और खुले दरवाज़े ,
पर अभेद्य दीवार सरीखे मेरे पापा....

हर ग़लती हर नादानी की
बिन माँगे ही माफ़ी दे कर,
खोमोशी से हर चिंतन को
ले चलते हैं उचित डगर पर,

रीते हाथों में ना जाने
सपने कब गपचुप बोते हैं,
फिर सच्चाई से जीवन का
समझाते हैं अक्षर-अक्षर,

सर पर हाथ फेर
कर देते पावन अंतस,
ऐसी निर्मल धार सरीखे मेरे पापा....
Comment by Afroz 'sahr' on October 11, 2017 at 4:22pm
मोहतरमा प्राची साहिबा आदाब बहुत ही भावनात्मक गीत लिखा आपने मन को प्रफुल्लित कर गया बहुत बधाई आपको।,,,,,,
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 11, 2017 at 2:53pm

बहुत सुंदर गीत आदरणीया | हार्दिक बधाई |

Comment by Samar kabeer on October 11, 2017 at 11:57am
मोहतरमा डॉ.प्राची सिंह साहिबा आदाब,पापा को समर्पित बहुत सुंदर गीत लिखा है,प्रवाह,शिल्प हर एतिबार से सशक्त इस प्रस्तुति हेतु दिल से बधाई स्वीकार करें ।
'मगर झुंझलाहट का भाव
कभी ना आया'
ये पंक्ति लय में नहीं है,इसे इस तरह करना उचित होगा :-
'लेकिन झुंझलाहट का भाव
कभी न आया'

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
1 hour ago
Admin posted discussions
16 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
16 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
17 hours ago
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
yesterday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
Monday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
Monday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service