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जला पुतला सभी ने पाप की कर दी विदाई है//अलका 'कृष्णांशी'

1222 1222 1222 1222 

.

हमारे सामने सबने कसम गीता की खाई है
जला पुतला सभी ने पाप की कर दी विदाई है

.

सभी ये बेटियाँ बहनें सुरक्षित आज से होंगी
अजी रावण की रावण ने यहां कर दी पिटाई है

.

बड़ी बातें सभी करते नही है राम कोई भी
कहीं हिन्दू कहीं सिख है यहाँ कोई ईसाई है

.

न होती धर्म की सेवा न है संस्कार से नाता
दया बसती नही दिल में दिखावे की भलाई है

.

लगाकर हाथ आँचल को वहीं खींसे निपोरेंगे
अजी भीतर के रावण ने हथेली अब खुजाई है

.

उठो इस कलयुगी रावण से अब दुश्वार है जीना
यहाँ साधू जिसे समझा वो निकला आतताई है

.

अहंकारी की मस्ती में मर रही आज मानवता
कहीं है द्रोपदी लुटती कहीं सीता जलाई है

.

जलाए हर बरस रावण जहां भर में दिखाने को 
मगर भीतर के रावण को नही माचिस दिखाई है

.

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on October 2, 2017 at 4:39am
आद0 अलका जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास, कटाक्ष व्यंग लिए सभी अशआर अपने मे कुछ समेटे हुए हैं।बधाई।
Comment by Mohammed Arif on October 1, 2017 at 10:35pm
आदरणीया अलका जी आदाब, कोई एक शे'र नहीं हर शे'र बहुत कुछ कहता है जिसका आशय बिल्कुल स्पष्ट है और प्रेरणादायक है । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें। बाक़ी गुणीजन अपनीक्षराय देंगे ।

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