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ग़ज़ल-गलतियाँ किससे नही होतीं-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल
2122 2122 2122 212

गलतियाँ किससे नही होतीं भला संसार में
है मगर शुभ आचरण निज भूल के स्वीकार में

शून्य में सामान्यतः तो कुछ नही का बोध पर
है यहाँ क्या शेष छूटा शून्य के विस्तार में

आधुनिकता के दुशासन ने किया ऐसे हरण
द्रौपदी निर्वस्त्र है खुद कलियुगी अवतार में

सूर्य को स्वीकार गर होता न जलना साथियों
तो भला क्या वो कभी करता प्रभा संसार में

व्यर्थ ही व्याख्यान आदर्शों पे देने से भला
अनुसरण कुछ कीजिये इनका निजी व्यवहार में

लालसा दिल में यही मिल जाय वो मीठा शहद
जो मिला था माँ की लोरी थपकियों और प्यार में

प्रेम पूजा प्रेम ईश्वर प्रेम के ही पंथ सब
प्रेम ही कुरआन गीता बाइबिल के सार में

श्रम दिलों को जीतने में चाहिए उतना बली
चाहिए जितना हमें निज अहं के संहार में

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 1573

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Comment by रामबली गुप्ता on October 25, 2017 at 8:45pm
गीतिका पसंद करने के लिए बहुत बहुत आभार आद0 भाई अजय तिवारी जी
Comment by रामबली गुप्ता on October 25, 2017 at 8:44pm
शुक्रिया भाई बसंत कुमार शर्मा जी
Comment by रामबली गुप्ता on October 25, 2017 at 8:43pm
धन्यवाद भाई बलराम धाकड़ जी
Comment by रामबली गुप्ता on October 25, 2017 at 8:42pm
आद0 सुरेन्द्र इंसान जी बहुत बहुत आभार
Comment by रामबली गुप्ता on October 25, 2017 at 8:41pm
आदरणीय सौरभ सर सराहना और प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार
Comment by Ajay Tiwari on October 18, 2017 at 6:45am

आदरणीय रामबली गुप्ता जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं.

सादर 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 16, 2017 at 4:21pm

बहुत खूब अशआर 

Comment by Balram Dhakar on October 11, 2017 at 6:11pm
बहुत शानदार ग़ज़ल आदरणीय रामबली सा०
बहुत बहुत बधाई।
Comment by surender insan on October 8, 2017 at 8:37am
आदरणीय राम बलि गुप्ता जी आदाब। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है बधाई स्वीकार करे जी।।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 7, 2017 at 10:18pm

बहर में सधी पंक्तियों से आपकी प्रस्तुति अवश्य पठनीय श्रेणी की हो गयी है, भाई रामबली जी. आपके प्रयासों से मन प्रसन्न है.

गीतिका की विधा पर आपका हुआ प्रयास श्लाघनीय है.

शुभेच्छाएँ 

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