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सिहरन ..../ज़न्नत ...

सिहरन ....

ये किसके आरिज़ों ने चिलमन में आग लगाई है।
ये किसकी पलकों ने फिर ली आज अंगड़ाई है।
होने लगी सिहरन सी अचानक से इस ज़िस्म में -
ये किसकी हया को छूकर नसीमे सहर आई है।

............................................................
ज़न्नत ...

वो उनके शहर की हवाओं के मौसम l
कर देते हैं यादों से आँखों को पुरनम l
तमाम शब रहती है ख़्वाबों में ज़न्नत -
पर्दों से हया के छलकती .है शबनम l


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:09pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी भाई साहिब सृजन के भावों अपनी आत्मीय स्वीकृति एवं सुझाव का  दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:08pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब  ... प्रस्तुति को अपनी सहमति देती प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया। भविष्य में इसका ध्यान रखूंगा सर। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2017 at 6:27pm

आदरनीय सुशील भाई , मुक्तक के भाव प्यारे लगे , बधाई स्वीकार करें । बाक़ी मै भी आ. समर भाई जी से सहमत हूँ , लय बाधित लग रही है ।

Comment by Samar kabeer on September 1, 2017 at 9:32pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,दोनों ही मुक्तक भाव के लिहाज़ से अच्छे लगे,अगर आप इनकी मात्राएँ भी लिख देते तो कुछ आसानी होती कहने में,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on August 31, 2017 at 4:58pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी मुक्तकों अपनी मधुर प्रशंसा से शोभित करने का हार्दिक आभार।  

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 30, 2017 at 5:13pm

दोनों ही रचनाएँ सुंदर है क्या इनको नज्म कहेंगे या मुक्तक आदरणीय ? सादर बधाई |

कृपया ध्यान दे...

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