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रक्त संचार ( लघुकथा)

बुधिया को जब पता चला कि घनश्याम बाबू का एक्सीडेंट हो गया है और उनको खून कि सख्त जरुरत है , वह व्याकुल हो गया | घनश्याम बाबू से वैसे तो उसने कभी भी प्यार के दो बोल नहीं सुने थे , पर उनकी शक्शियत ने बुधिया को हमेशा आकर्षित किया था , उनके लिए उसके मन में आदर सत्कार था , गाँव के मुखिया घनश्याम बाबू ,एक कट्टर ब्राह्मण थे , इस ज़माने में भी वे जात पात को मानते थे , उनके घर वाले उनको बहुत समझाते ," समय बदल गया है , अपनी सोच बदलें |" इस पर वे अपने सर पर चुटिया को दिखाकर कहते ," समय बदल गया है तो क्या हुआ , ब्राह्मण होने के संस्कार भूल जाऊं ? भ्रष्ट हो चुके हो तुम सब , मुझे मेरे विचारों के साथ जीने दो |" सब चुप हो जाते |
घनश्याम बाबू के घर का नौकर बुधिया का खास मित्र था , वह सब बातें बुधिया को बता देता था , बुधिया कहता ," देखना एक दिन आएगा , यह बदलेंगे समय इनको सबक सिखाएगा | "
एक्सीडेंट में घनश्याम बाबू के पैर काटने की नौबत आ गयी थी, ट्रैन की पटरी पार करते वक़्त उनका पैर फंस गया था , तेजी से आती हुई ट्रैन ने उनके ऊपर से चली गयी थी , धड़ पटरी के किनारे था सो बच गया पर पैर नहीं बच पाए | रक्त बह चूका था, डॉक्टर ने जांच कर के यह घोषणा कर दी थी की इनको एक दो दिन में ही ऑपरेट करना होगा , और इनका ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव है , इस ग्रुप का ब्लड लाना ही होगा , घर वालों में से सिर्फ बड़े बेटे का ब्लड ग्रुप सेम था , पर डॉक्टर के हिसाब से करीब ४ यूनिट ब्लड की जरुरत थी , खूब खोजने पर ब्लड बैंक से दो यूनिट प्राप्त हुआ , अब भी एक यूनिट ब्लड चाहिए था , अब क्या होगा यही सोच कर उनके परिवार वाले परेशान हो रहे थे , अस्पताल में जब इस सब की चर्चा कर रहे थे तभी बुधिया वहां आया और उसने कहा , " बाबूजी को मैं खून दूंगा , मेरा भी ओ पॉजिटिव ग्रुप है | "
घनश्याम बाबू के बेटे ने पूछा , " तुझे कैसे पता ?"
वह बोला , " बाबू ,मैंने भी १२ तक की पढ़ाई की है | "
ऑपरेशन के बाद जब उनको होश आया , उनके पूछने पर उनको सब बताया गया | वहीँ उन्होंने एक नाई को बुलवाकर अपनी चुटिया कटवा ली |
अपने अंदर रक्त संचार होने वाले रक्त से अब उनको प्यार हो गया था |


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by surender insan on August 16, 2017 at 9:45am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी सादर नमन जी। आपका प्रयास अच्छा है। बधाई स्वीकार करे जी। बाकि आदरणीय रवि जीने कह ही दिया है ।सादर जी।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 15, 2017 at 9:38pm

सादर धन्यवाद आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 15, 2017 at 9:36pm

आदाब आदरणीय समर भाई जी , जी भाई जी आदरणीय रवि सर जी ने जो बातें समझाई हैं उनको ध्यान में रखूंगी सादर |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 15, 2017 at 9:35pm

आदरणीय रवि सर आपने जो बातें बतायीं है उनपर ध्यान दूंगी | जी आपने सही कहा विषय पुराना है नवीनता नहीं है , पर ऐसा आज भी होता तो है न यही सोच कर प्रयास किया था , आपने जो दिशा दिखाई है उसको ध्यान में रखकर दुबारा प्रयास करुँगी | सादर धन्यवाद् सर भैया |

Comment by Mohammed Arif on August 15, 2017 at 8:18pm
आदरणीय कल्पना भट्ट जी आदाब,लघुकथा का अच्छा प्रयास ।आदरणीय रवि प्रभाकर जी सबकुछ कह चुके हैं । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on August 15, 2017 at 6:40pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,लघुकथा का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें,बाक़ी जनाब रवि प्रभाकर साहिब ने बता ही दिया है,उनकी बातों का संज्ञान लें ।
Comment by Ravi Prabhakar on August 15, 2017 at 6:27pm

आदरणीय कल्‍पना भट्ट जी, वर्ण व्‍यवस्‍था पर चोट करती इस लघुकथा में नवीनता का अभाव है । लघुकथा की पहली पंक्‍ितयां पढ़कर ही आगे क्‍या होने वाला है उसका अंदाज़ा लग गया था । कथा साहित्‍य में कौतुहलता का होना अतिआवश्‍यक माना जाता है । लघुकथा में आपने बताया है कि बुधिया घनश्‍याम की शख्‍़सीयत से प्रभावित था पर साथ ही लिख दिया कि घनश्‍याम कट्टड़ ब्राह्म्‍ण थे और घनश्‍याम से उसने कभी प्‍यार के दो बोल नहीं सुने थे । और बुधिया दलित वर्ग से संबधित था इसका संकेत भी मिलता है तो.... बुूधिया के प्रभावित होने का कोई कारण तो समझ में नहीं आ रहा यानि यहां कथ्‍य और तथ्‍य में सामंजस्‍य नज़र नहीं आ रहा । चुटिया कटवाने वाले प्रसंग के स्‍थान पर कोई अन्‍य संकेत देना अधिक बढ़ीया रहता । सादर

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