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ग़ज़ल (इंसानियत)

2212 2212 2212 2212

इंसान के खूँ की नहीं प्यासी कभी इंसानियत,
फिर भूल तुम जाते हो क्यों अक्सर यही इंसानियत।

जो जिंदगी तुम दे नहीं सकते उसे लेते हो क्यों,
पर खून बहता ही रहा रोती रही इंसानियत।

जब गोलियाँ बरसा जमीं को लाल खूँ से तुम करो,
संसार में आतंक को ना मानती इंसानियत।

हे जालिमों जब जुल्म तुम अबलों पे हरदम ही करो,
मजलूम की आहों में दम को तोड़ती इंसानियत।

थक जाओगे तुम जुल्म कर जिंदा रहेगी ये सदा,
करता 'नमन' इसको सदा सबसे सही इंसानियत।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on March 23, 2017 at 7:35pm

आदरणीय वासुदेव अग्रवाल साहेब .........बहुत खूब ...... हार्दिक बधाई स्वीकार करें 

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 23, 2017 at 5:24pm
आ0 गिरिराज जी आपने ग़ज़ल की गहराई में जाकर अपने विचार रखे आपका हृदय तल से आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 23, 2017 at 9:32am

आदरणीय वासुदेव भाई , गज़ल अच्छी हुई है ,  आपने बहर निभाने मे  सफल रहे आप । शब्दों का चुनाव और जमाव अभी और समय चाहते हैं ...  ऐसा मुझे लगा ।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 22, 2017 at 4:41pm
आ0 सतविंद्र कुमारजी आपका हृदय तल से आभार।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 22, 2017 at 2:24pm
आदरणीय वासुदेव अग्रवाल जी,हार्दिक बधाई उस उम्दा गजल के लिए।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 21, 2017 at 6:09pm
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी आपसे ग़ज़ल के लिए हौसला अफजाई मिली मैं धन्य हुआ। हृदय से आभार।
Comment by Mohammed Arif on March 21, 2017 at 1:20pm
आदरणीय वासुदेव जी आदाब, मानवता का प्रबल समर्थन करती इस ग़ज़ल के लिए आपको शेर दर शेर मुबारक़बाद पेश करता हूँ ।

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