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#गजल#(खबरी)
***
22 22 22 22
बात कहूँ मैं मिर्च मिला के
सुन लेता हूँ कान लगा के।1

दूर कहीं से लाता कौड़ी
चिपका देता खूब सटा के।2

मेरी कथनी हरदम साबित
बढ़ जाता हूँ बात बढ़ा के।3

शास्त्र-पुराण उखड़ जाते हैं
मैं रहता हूँ पाँव जमा के।4

मेरा मौसम हरदम रहता
क्या कर सकते मुँह बिचका के।5

जूतम पैजार हुई सबकी,
जूझ रहे फिर कुर्सी पा के।6

चाहत की बलिहारी कितनी!
रखता मैं हर बार जगा के।7

शब्द सँवरते कहकर दिल की
बलते फिर-फिर आग लगा के।8

तैरे चाहे कोई जितना
कब निकलामँझधार नहा के?9

रह सकते बेदाग कभी क्या?
काजल के कमरे में आ के।10

कौवे की पहचान छिपेगी?
चाहे कोई गाना गा के।11
@मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Neelam Upadhyaya on February 20, 2017 at 12:27pm

अदरणीय मनन जी, बहुत ही दिलचस्प रचना है । बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Manan Kumar singh on February 19, 2017 at 9:35pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी,गजल के तत्व आपको जँचे, यह मेरी भी और गजल की भी खुशकिस्मती है।आपका दिली तौर पर आभारी हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on February 19, 2017 at 9:33pm
आदरणीय आरिफ भाई,आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Manan Kumar singh on February 19, 2017 at 9:32pm
आदरणीय सुरेन्द्रनाथ जी,आपकी टिप्पणी प्रेरणास्पद है।मैं दिली तौर पर आपका आभारी हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 19, 2017 at 7:07pm

बहुत मजेदार ग़ज़ल कही है बढ़िया कटाक्ष आद० मनन जी बहुत वहुत बधाई 

Comment by Mohammed Arif on February 19, 2017 at 4:45pm
आदरणीय मनन जी आदाब, बहुत बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए ।
Comment by नाथ सोनांचली on February 19, 2017 at 3:01pm
आदरणीय मनन कुमार जी सादर अभिवादन। उम्दा गजल, पढ़ कर मजा आ गया, बार बार पढ़ने को जी कर रहा है, । बहुत मस्त लिखा भाई जी आपने। बधाई ।

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