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जनाब का हुक्म मानकर.... ग़ज़ल

1222-1222-1222-1222


जहां में आप सा हमको कोई कामिल नहीं मिलता
मिले हमको कई अच्छे मगर आकिल नहीं मिलता 


जिन्हें तूफ़ान से लड़ना उन्हें फिर कौन रोकेगा
वही पाते हैं मंजिल को जिन्हें साहिल नहीं मिलता


तुम्हें मालूम है लेकिन बता सकते नहीं किस्सा
अजब घटना घटी देखो हमें फाजिल नहीं मिलता


खुदा मालिक है दुनिया का उसे सबसे मुहब्बत है
सहारा वो नहीं देता कभी साहिल नहीं मिलता


गगन मिट्टी हवा पानी हमें जीने को देता है
बसा कण कण में वो देखो कहाँ शामिल नहीं मिलता


दया करना गरीबों पे यही तो ईद है कहती
मिलेगी देख फिर खुशियाँ खुदा गाफिल नहीं मिलता
मुनीश 'तन्हा'...
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by munish tanha on February 10, 2017 at 10:54am

आदरणीय समर जी आदाब ,साहिल नही मिलता आपने गलती की तरफ ध्यान दिलाया, आपका आभार आगे भी मार्गदर्शन करते रहें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 2, 2017 at 8:57am

आदरणीय मुनीश भाई , बेहरईन गज़ल कही है , दिली मुबारक बाद हाज़िर है , कुबूल करें ।

Comment by Samar kabeer on January 30, 2017 at 10:45pm
जनाब मुनीश तन्हा जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

"सहारा वो नहीं देता कभी साहिल नहीं देता"

इस मिसरे में रदीफ़ बदल गई है देखियेगा ।
Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 29, 2017 at 4:14pm

आदरणीय मुनीश तनहा जी बहुत उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई |

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 29, 2017 at 11:21am
आदरणीय मुनीश तन्हा साहब अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई

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