For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"आखिर क्यों नहीं कर लेती उससे शादी, जब साथ साथ रहती हो तो दिक्कत क्या है", उसने घर से निकलते हुए बेटी को टोका| बेटी ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर आगे जाने लगी|
"अभी तुमको नहीं समझ में आ रहा है, कुछ साल बाद समझोगी| आखिर कुछ तो सोचो भविष्य के लिए", उसने फिर से समझाने की कोशिश की|
अबकी बार बेटी पलटी और वापस कमरे में आ गयी| उसके पास आकर उसने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से बोली "तुम्हें क्या दिक्कत है माँ, हम लोग खुश हैं और जब तक सब ठीक है, साथ रहेंगे"|
"लेकिन कोई बंधन तो होना चाहिए साथ रहने के लिए", उसने फिर से कहा|
"कैसा बंधन माँ, तुमने भी तो शादी की थी और सारे बंधनों में तुम्हीं बंधती रही, पापा तो किसी और बंधन में बंध गए| और उस बंधन के कुछ निशान आज भी तुम्हारे बदन पर दिखते हैं, इसके बाद भी तुम यह सब कह रही हो"|
वह थोड़ी देर बेटी को देखती रही, अचानक उसका हाथ अपने चेहरे पर चला गया| एक कटे का दाग था जिसे वह कितनी भी कोशिश के बाद मिटा नहीं पायी थी|
"तुम्हारा बंधन है ना मेरे लिए, कहीं भी रहूंगी, तुम्हारा हाथ तो रहेगा ही मेरे सर पर| अगली बार ज्यादा दिन की छुट्टी लेकर आउंगी तो खूब घूमेंगे हम दोनों", कहती हुई बेटी ने प्यार से उसके ललाट पर एक चुम्बन दिया और निकल गयी|
उसे लग रहा था जैसे आज वह कटे का दाग मिट गया था|
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 765

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by विनय कुमार on December 28, 2016 at 4:03pm

बहुत बहुत आभार आ कल्पना भट्ट जी 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 28, 2016 at 1:40pm
वाह आदरणीय विनय सर । गज़ब की कथा हुई है । अलग मिज़ाज लिए हुए । हार्दिक बधाई ।
Comment by विनय कुमार on December 28, 2016 at 1:30pm

बहुत बहुत आभार आ तेज वीर सिंह जी

Comment by विनय कुमार on December 28, 2016 at 1:30pm

बहुत बहुत आभार आ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी इस हौसला बढ़ाने वाली टिपण्णी के लिए| इस मुद्दे पर खुले दिमाग से सोचने की और निष्कर्ष निकालने की जरुरत है  

Comment by विनय कुमार on December 28, 2016 at 1:28pm

बहुत बहुत आभार आ प्रतिभा पांडे जी इस हौसला बढ़ाने वाली टिपण्णी के लिए 

Comment by विनय कुमार on December 28, 2016 at 1:27pm

बहुत बहुत आभार आ मिथिलेश जी, बड़ा मुश्किल होता है ऐसे में फैसला कर पाना

Comment by TEJ VEER SINGH on December 25, 2016 at 6:15pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विनय कुमार जी। बहुत शानदार प्रस्तुति ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 24, 2016 at 3:01pm

आ० आज की सोच को आपने बखूबी रूपायित किया . पर यह सोच सही निदान है इस पर अनुभव की बहस भी आवश्यक है . फिलहाल अभिनव परिवेश में कथा आधुनिक सोच को परिभाषित करने ने पूरी तरह सफल है .

Comment by pratibha pande on December 24, 2016 at 8:38am

 आपने कोई अंत थोपने की कोशिश नहीं की, और ये ही आपकी कथा का सबसे सशक्त पक्ष है ...कई बार सकारात्मकता के बोझ में अंत नाटकीय हो जाता है ......बहुत बढ़िया रचना   हार्दिक बधाई आपको आदरणीय विनय जी .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2016 at 1:43am

आदरणीय विनय जी, बहुत झन्नाटेदार लघुकथा लिखी है आपने. वाकई दिमाग झन्ना गया. समस्या के इस निदान को न तो स्वीकार कर पा रहा हूँ और न ही इनकार कर पा रहा हूँ. बधाई इस प्रस्तुति पर. 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Wednesday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Feb 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Feb 28

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service