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बह्र:2122 2122 2122 212
--
बातें ही बातें रही हैं आज करने के लिए
हामी उसने अब भरी ना साथ चलने के लिए।

गिर रहे हर बार फिर भी अक्ल तो आई नहीं
एक ठोकर ही सही है बस सँभलने के लिए।

घुल फ़िजा में अब गया है जह्र चारों ही तरफ
ना जमीं ही है बची कोई टहलने के लिए।

चाहता है सीखना तो कर सही कौशिश सभी
फौरी पढ़ना कब सही है कुछ समझने के लिए।

ना रुकावट से डरे जो वो बढ़े राणा सही
हाँ ,मगर कुछ रास्ते भी हों तो चलने के लिए।

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 15, 2016 at 4:10pm
आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्र जी प्रोत्साहन के लिए तहेदिल आभार!
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 7, 2016 at 7:11pm
सार्थक सन्देश देती शानदार ग़ज़ल के लिये हार्दिक बधाई स्वीकार करें सआदत
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 5, 2016 at 11:28pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब।आपको प्रयास पसन्द आया इसके लिए बहुत बहुत आभार।
Comment by Samar kabeer on November 4, 2016 at 5:38pm
जनाब सतविन्द्र कुमार'राणा'जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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