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ग़ज़ल ( शुरुआते मुहब्बत हो गयी )

ग़ज़ल ( शुरुआते मुहब्बत हो गयी )

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(फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन- फाइलुन )

यक बयक मुझ पर सितमगर की इनायत हो गयी ।

ऐसा लगता है शुरुआते  मुहब्बत   हो  गयी ।

की वफ़ा गैरों से अहदे इश्क़ अपनों से किया

जानेमन यह तो अमानत में खयानत हो गयी ।

यह नतीजा तो अज़ीज़ों पर  यक़ी करने का है

यूँ नहीं पैदा सनम के दिल में नफरत हो गयी ।

दिल की अब कीमत कहाँ है हुस्न के बाजार में

ऐसा लगता है मुहब्बत में तिजारत  हो गयी ।

फूल क्या हैं खार भी तेरे मुखालिफ हो गए

बागबाँ  लगता है गुलशन में बगावत हो गयी ।

वह तसव्वुर में मेरे रहते हैं हर दम दोस्तों

कौन कहता है मेरी दिलबर से फुरक़त हो गयी ।

वह अता करने ही वाले हैं वफाओं का सिला

मुझको यह तस्दीक़ सुनते सुनते मुद्दत हो गयी ।

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by शिज्जु "शकूर" on October 5, 2016 at 4:52pm

आ. तस्दीक अहमद खान साहब अचछी ग़जल हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Kalipad Prasad Mandal on October 5, 2016 at 7:20am

दिल की अब कीमत कहाँ है हुस्न के बाजार में

ऐसा लगता है मुहब्बत में तिजारत  हो गयी ।

 

बहुत सुन्दर कहा है ! उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई आपको तस्दीक अहमद खान साहब 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 4, 2016 at 8:49pm

मोहतरम जनाब श्याम नारायण  साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी --

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 4, 2016 at 8:48pm

मोहतरम जनाब सुशील सरना साहिब , ग़ज़ल में गहराई से आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी --

Comment by Shyam Narain Verma on October 4, 2016 at 5:03pm
बहुत बहुत बधाई आपको इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए सादर ।
Comment by Sushil Sarna on October 4, 2016 at 2:15pm

दिल की अब कीमत कहाँ है हुस्न के बाजार में
ऐसा लगता है मुहब्बत में तिजारत हो गयी ।


बहुत खूब आदरणीय तस्दीक साहिब .... आपके अशआर बहते झरने की ठंडक का सुकून देते हैं .... अल्फ़ाज़ों में वो कशिश है कि सबा भी एक बार तो रुक कर सलाम करे ... बहरहाल इस दिलकश ग़ज़ल के लिए दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर।

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