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गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल- इश्क़ की राहों में

2122 2122 212


इश्क़ की राहों में हैं रुसवाईयाँ।
हैं खड़ी हर मोड़ पर तन्हाईयाँ।।

क्या करे तन्हा बशर फिर धूप में।
साथ उसके गर न हो परछाइयाँ।।

ऐ खवातीनों सुनों मेरा कहा।
क्यूँ जलाती हो दिखा अँगड़ाइयाँ।।

चाहता हूं डूबना आगोश में।
ऐ समंदर तू दिखा गहराइयाँ।।

दिल दिवाने का दुखा, किसको ख़बर ?
रात भर बजती रही शहनाइयाँ।।

तुम गये तो जिंदगी तारीक है।
हो गयी दुश्मन सी अब रानाइयाँ।।

दूर हो जाये जड़ों से ये पवन।
ऐ खुदा इतनी न दे ऊँचाइयाँ।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बशर= आदमी
तारीक= अंधकारमय

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Comment by डॉ पवन मिश्र on September 13, 2016 at 10:20am

बहुत बहुत आभार आदरणीया कान्ता जी

Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 3:03pm
दूर हो जाये जड़ों से ये पवन।
ऐ खुदा इतनी न दे ऊँचाइयाँ....... वाह! वाह! बेहतरीन गजल कही है आपने आदरणीय पवन जी।
Comment by डॉ पवन मिश्र on September 2, 2016 at 7:58pm
आदरणीय समर साहब।। बहुत बहुत शुक्रिया। आपके स्नेह से अभिभूत हूं। ग़ज़ल लिखना बस शुरू ही किया है। आप का मार्गदर्शन अपेक्षित है। आपकी सलाह के अनुसार सुधार का प्रयास करते हैं। आभार
Comment by डॉ पवन मिश्र on September 2, 2016 at 7:52pm
आदरणीय गिरिराज जी, बहुत बहुत आभार आपका। आशय था ही यह कि धूप में रहने वाली परछाईं भी जब धूप में साथ न् दे तो इस कदर अकेला हुआ इंसान क्या करे।
Comment by Samar kabeer on September 2, 2016 at 4:16pm
जनाब डॉ.पवन जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
तीसरे शैर के ऊला मिसरे में आपने लफ़्ज़ "खवातीनों"लिया है जो ग़लत है,'खातून'शब्द का बहुवचन "खवातीन"होता है न कि "खवातीनों"देखियेग ।
जनाब गिरिराज भंडारी जी की बात पर भी विचार कीजियेगा ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2016 at 9:56am

आदरनीय पवन भाई , बहुत खूब सूरत गज़ल कही आपने , दिली बधाइयाँ स्वीका करें ।
एक शेर से सहमत नही हो पा रहा हूँ , आप भी एक बार सोचियेगा , वैसे किसी की सहमति कथ्य पर ज़रूरी नही है , वस मुझे वास्तविकता से परे लग रही है बात --

क्या करे तन्हा बशर फिर धूप में।
साथ उसके गर न हो परछाइयाँ।।        परछाइयाँ धूप मे तो रहतीं ही हैं , हाँ छाया मे ज़रूर साथ छोड़ देती है -- तो क्या ऐसा कहना उचित नही होगा --

क्या करे तन्हा बशर फिर छाँव् में।
साथ उसके गर न हो परछाइयाँ।।   या - छोड़ दीं है साथ भी परछाइयाँ

   -- बस यूँ ही एक सलाह है ।

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