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उलझे हुए लोग/ लघुकथा

आज भी चबूतरे पर बैठने कोई नहीं आया। चबूतरा उदास था। साल में सिर्फ दो बार ही यहाँ सांस्कृतिक आयोजन हुआ करता था बाकि दिनों में सुबह-शाम मोहल्ले के बुजूर्गों का जमावड़ा और उनके ठहाकों का शोर रहता था। हालांकि उनके ठहाकों का मुख्य श्रोत युवाओं के प्रति कटाक्ष ही हुआ करता था।
कौन युवा ? अरे , वही जिन्होंने एकता और सौहार्द्रता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दूर्गा पूजा समीति बना कर इस चबूतरे का निर्माण करवाया था।
जिनके कारण कॉलोनी को गंगा- जमुनी तहजीब के कारण शहर में सम्मान मिला करता है।
बच्चों ने तो समरसता को आत्मसात कर लिया लेकिन ये बड़े लोग ,ऊफ्फ !

परसों की ही बात है ,रोज की तरह लगे हुए थे ये लोग बतकुचन में । युवाओं को शऊर नहीं , धर्म जाति सब लीलने पर लगे है । बहन , बेटियों के बराबर दर्जा देने वाली बातें थोथलेबाजी के अलावा कुछ नहीं है वगैरह वगैरह । आजू बाजू से बेखबर लगे हुए थे सब मिल कर और बीच -बीच में खींसे निपोर... होss...होss.... की ध्वनि एक साथ निकालते ।

तभी रधुवीर के छोरे ने सुन लिया और खबर कर दिया जाकर सबको।

दूसरे दिन जैसे ही इनकी ठहाकों की गुंज से चबूतरे का सन्नाटा टूटा कि सबके सब हाजिर । नया जोश , कहाँ थमने वाले , वे लोग ताक लगा कर बैठे ही थे। युवाओं नें उन सबको चबूतरे के चारों ओर से घेर लिया और पूजा समीति की समस्त सांस्कृतिक जिम्मेदारी उठा लेने का प्रस्ताव रख दिया उनके सामने।

जिम्मेदारी लेने की बात शुरू होते ही सबको मानो साँप सूँघ गया। एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। जरा ही देर में वे सभी आहिस्ता- आहिस्ता वहाँ से निकलते बने।
उनको जाते हुए देख कर एक ने कहा, अंकल ,हम सब आपके लिये यहाँ इंतजार करेंगे,जल्दी आकर आप लोग अपना चार्ज सम्भाल लीजियेगा ।
उस दिन को आज तीन दिन हो गये युवाओं के साथ चबूतरा भी उनका इंतजार कर रहा है।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 9, 2016 at 9:12pm

कटाक्ष  करती इस लघुकथा की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया कांता जी 

Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:14pm
आपको लघुकथा प्रभावित करने में सफल रहा ,यह तो मेरे लिये अवार्ड मिलने जैसा महसूस हो रहा है।आपसे सराहना पाना सुखद है। आभारी हूूँ दिल से।
Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:12pm
तंज के इस तीर का मर्म समझने के लिये हृदय से आभार आपका आदरणीय समर कबीर जी।
Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:11pm
उलझे हुए लोगों की उलझनों के तह तक पहुँच कर लघुकथा को पसंद करने के लिये हृदय से आभार आपका आदरणीय सुशील सरना जी।
Comment by pratibha pande on September 1, 2016 at 7:33pm

//जिम्मेदारी लेने की बात शुरू होते ही सबको मानो साँप सूँघ गया। एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। जरा ही देर में वे सभी आहिस्ता- आहिस्ता वहाँ से निकलते बने//      ये   कुछ करेंगे भी नहीं और जो भी नया है उसकी आलोचना भी करेंगे ... तथाकथित वरिष्ठों की मानसिकता का सटीक चिट्ठा खोला आपने ... कथा की शैली प्रभावशाली है ...आपको हार्दिक बधाई प्रेषित है आदरणीया कांता जी 

Comment by Samar kabeer on August 31, 2016 at 6:07pm
मोहतरमा कांता रॉय जी आदाब,बहुत उम्दा जज़्बे को लेकर बहतरीन तंज़ के तीर चलती इस लघुकथा के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on August 31, 2016 at 2:08pm

आदरणीया कांता जी यथार्थ को उजागर करती और तीक्ष्ण कटाक्ष से परिस्थितिजन्य भाव को चित्रित करती इस लघुकथा की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई। 

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