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फ़इलातु फ़ाइलातुन फ़इलातु फ़ाइलातुन

है यही मिशन हमारा कि हराम तक न पहुँचे
कोई मैकदे न जाए कोई जाम तक न पहुँचे

थे ख़ुदा परस्त जितने,वो ख़ुदा से दूर भागे
जो थे राम के पुजारी,कभी राम तक न पहुँचे

ज़रा सीखिये सलीक़ा,नहीं खेल क़ाफ़िए का
वो ग़ज़ल भी क्या ग़ज़ल है जो कलाम तक न पहुँचे

लिखो तज़किरा वफ़ा का तो उन्हें भी याद रखना
वो सितम ज़दा मुसाफ़िर जो मक़ाम तक न पहुँचे

लिया नाम तक न उसका,ए "समर" यही सबब था
मिरी आशिक़ी के क़िस्से रह-ए-आम तक न पहुँचे

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on December 26, 2016 at 11:33pm
जनाब नवीन जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Samar kabeer on December 26, 2016 at 11:32pm
जनाब रोहिताश्व मिश्रा जी आदाब,बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2016 at 11:31pm
वाह्ह्ह्ह्ह्ह् आ0 कबीर सर बहुत खूबसूरत ग़ज़ल । हार्दिक बधाई ।
Comment by रोहिताश्व मिश्रा on December 21, 2016 at 8:44pm
वाह समर Bhai Ji
Comment by Samar kabeer on September 15, 2016 at 10:50pm

इसे कहते हैं सुख़न फहमी,फ़न की दाद देना भी कोई आपसे सीखे,आप का हुक़्म सर आँखों पर हुज़ूर-वाला ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2016 at 7:43pm

//फ़िलबदीह कहने का कारण ये है कि तरही मुशायरे के अंतिम चरण में ये ग़ज़ल हुई,इसलिये कह दिया //

अब से ख़बरदार साहब, कभी जो आपने इत्मिनान से ग़ज़लग़ोई की ! आप ऐसे ही फ़िलबदीह करते रहें और हमें मुतस्सिर करते रहें.  

शुभ-शुभ

Comment by Samar kabeer on September 15, 2016 at 7:34pm
जनाब सौरभ पाण्डेय जी आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई,आपकी दाद पाकर मुग्ध हूँ,और हौसला चार गुना बढ़ गया है,आपकी दाद-ओ-तहसीन और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
"थे ख़ुदा परस्त जितने वो ख़ुदा से दूर भागे"
जो थे राम के पुजारी कभी राम तक न पहुंचे"
ये शैर में आपकी नज़्र करता हूँ ।
फ़िलबदीह कहने का कारण ये है कि तरही मुशायरे के अंतिम चरण में ये ग़ज़ल हुई,इसलिये कह दिया । आपकी सराहना के लिये पुनः धन्यवाद ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2016 at 6:37pm

आदरणीय समर साहब ! जय हो.. ! आपकी ग़ज़ल पर बस इतना ही कहना मुनासिब होगा, उस्तादों की कही ग़ज़लों से ग़ज़लें सीखी जाती हैं. उन पर तब्सिरा नहीं किया जाता.

  
सही कहा आपने साहब ! --
ज़रा सीखिये सलीक़ा,नहीं खेल क़ाफ़िए का
वो ग़ज़ल भी क्या ग़ज़ल है जो कलाम तक न पहुँचे

 

निर्दोष पंक्तियों और मानीख़ेज़ अश’आर से धनी इस ग़ज़ल को आप जाने क्यों इसे फिल्बदी ग़ज़ल कह रहे हैं.
सलाम सलाम सलाम !

 

और, हुज़ूर, काश ये शेर मेरा होता -
थे ख़ुदा परस्त जितने,वो ख़ुदा से दूर भागे
जो थे राम के पुजारी,कभी राम तक न पहुँचे

 

इस ग़ज़ल के हवाले से हम इस सिम्फ़ के कुछ और जानकार हुए.
शुभ-शुभ

Comment by Samar kabeer on September 15, 2016 at 5:58pm
मोहतरमा अल्का जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत शुक्रिया ।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 5:47pm

वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह .......आदरणीय सर बहुत सुन्दर और  प्रभावशाली ग़ज़ल । हार्दिक बधाई ।

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