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इस बार सावन कुछ और होगा 

सखियों की छेड़ छाड़
और
और पिया का संग होगा |

झूलों पर गुनगुनाते गीत होंगे
फूलों के खुशबू
और
और पिया से मिलन होगा |

गुन गुनाएंगे पत्ते भी
हरी हरी डालियों पर
बिजली जब भी चमकेगी
पिया के आग़ोश में
यौवन पिघलेगा|

अधरों पर अधर
गीतों की फुहार होगी
सावन में लहेरिया पहने
सजन से मिलने की ख्वाहिश 

सजन होंगे प्रीत होगी
अब के सावन कुछ और होगा |

नाचेंगे मोर बागों में 

इन्द्रधनुष से भरा नभ होगा 

बिखरी हुई हरी हरी धरा पर 

काले बादलों का राज होगा 

कहीं दूर दो दिल धड्केंगे 

इस सावन में कुछ अलग होगा | 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 26, 2016 at 8:54am
धन्यवाद् जनाब समर साहब । अपको यह रचना पसन्द आयी सार्थक हुई यह ।
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 25, 2016 at 10:33pm

वाह ! वाह ! बहुत सुंदर सावनी रचना हुई है आदरणीया कल्पना भट्ट जी. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें इस मनभावन रचना के लिए. दो जगह "की" के लिए "के" का प्रयोग हुआ खला है. फूलों के/की खुशबू ////पिया के/की आगोश में // सादर.

Comment by Samar kabeer on July 24, 2016 at 11:47pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,बहुत सुंदर रचना हुई है सावन की आमद पर,बधाई स्वीकार करें ।

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