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काँटे का इंटरव्यू

क्यों भाई काँटे

शरीर ढूँढते रहते हो चुभने के लिए?
पैर से खींचकर निकाले गए
काँटे से मैंने पूछा
बस फैंकने को तत्पर हुई कि
वह बोल उठा
तुम मनुष्यों की
यही तो दिक़्क़त है
अपनी भूलों का दोष
तटस्थों पर मढ़ते आये हो
मैं कहाँ चल कर आया था
तुम्हारे पैरों तक ,चुभने को
मैं नहीं तुम्हारा पैर आकर
चुभा था मुझको
मैँ ध्यान मग्न पड़ा था
कि अचानक एक भारी सा पैर
आकर सीधा धँसा था
मेरे पूरे शरीर पर
उफ्फ वह घुटन भरी पीड़ा
ख़ून का नमकीन स्वाद..उबकाई
तुमने अनुभव किया क्या ?
तुम्हारा बिन्दु भर भाग
और मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व
सोचो पीड़ा का घनत्व
किसका अधिक रहा होगा
बात करते हो................
वह चुप हो गया
मैं अपलक कुछ देर उसे देखती रही
फिर ससम्मान उसे वहीं वापस रख दिया
जहाँ मैं उसे चुभी थी ।
तनूजा उप्रेती ,

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Tanuja Upreti on July 15, 2016 at 3:27pm
रचना पसंद करने के लिए हार्दिक आभार प्रतिभा जी, महर्षी जी एवं बैजनाथ जी।
Comment by maharshi tripathi on June 7, 2016 at 5:33pm
एक अच्छा संदेश देती इस कविता पर ढेरों बधाई आ !!!
Comment by pratibha pande on June 6, 2016 at 12:10pm

,काँटा जब पैर पड़ता है तभी चुभता है ,जानवर भी जब उकसाया जाता है तभी नुक्सान करता है , पूरी सृष्टि में एक मनुष्य ही  है जो बिना उकसाए भी दूसरों को दुःख देता है,   और फिर शिकायत भी करता है ,   सुन्दर सार्थक रचना पर बधाई प्रेषित है आदरणीया तनूजा जी  

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on June 5, 2016 at 6:41pm

आदरणीया तनुजा जी ...................बहुत बढ़िया | बधाई 

Comment by Tanuja Upreti on June 5, 2016 at 6:12pm
धन्यवाद शहजाद जी एवं प्रिय राहिला जी
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 5, 2016 at 4:06pm
आप दोनों की भेंटवार्ता से सबक़ लेते हुए मज़े ले रहा था कि इंटर्व्यू ख़त्म हो गया! मुझे लगा कि उसे दोबारा पीड़ा भोगने का अवसर देने के लिए उसी जगह छोड़ने के बजाए स्मृति चिन्ह की तरह ससम्मान संजो के रखा जाता , तो बेहतर होता। सुंदर भावपूर्ण प्रेरक कसी हुई रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीया तनुजा उप्रेती जी।
Comment by Rahila on June 5, 2016 at 3:56pm
हा. .हा. .हा. .बहुत, बहुत खूब, वाह. .बहुत शानदार रचना आदरणीया दीदी! बहुत बधाई । सादर

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