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मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन

"तज़मीन बर ग़ज़ल हज़रत सय्यद रफ़ीक़ अहमद "क़मर" उज्जैनी साहिब"

ख़ज़ाँ देखी कभी मौसम सुहाना हमने देखा है
अँधेरा हमने देखा है,उजाला हमने देखा है
फ़सुर्दा गुल कली का मुस्कुराना हमने देखा है
"ग़मों की रात ख़ुशियों का सवेरा हमने देखा है
हमें देखो कि हर रंग-ए-ज़माना हमने देखा है"

_____

वो मंज़र जब कि माँओं से जुदा होने लगे बच्चे
वो दिन भी याद है जब फूल से मुर्झा गये चहरे
लहू से सुर्ख़ थे दरिया,गली,बाज़ार और कूचे
"हज़ारों आफ़तें टूटीं, हज़ारों हादसे गुज़रे
न पूछो दौर-ए-आज़ादी में क्या क्या हमने देखा है"
_____

बताओ किस तरह बर्बादियों का ये समाँ देखें
कली को फूल को भँवरों को हम मातम कुनाँ देखें
यहाँ क्या देखने को रह गया है,क्या यहाँ देखें
"अब इन आँखों से क्या वीरानीए दौर-ए-ख़ज़ाँ देखें
जिन आँखों से बहारों का ज़माना हम ने देखा है"
_____

बजा है दोस्तों इनकी शिकायत हम समझते हैं
हमें मालूम है इसकी हक़ीक़त हम समझते हैं
नहीं समझोगे तुम इनकी मुसीबत हम समझते हैं
"ग़रीबों को है कयूँ दुनिया से नफ़रत हम समझते हैं
ग़रीबों से सुलूक-ए-अह्ल-ए-दुनिया हम ने देखा है"
_____

बग़ावत की "समर" हर सम्त से आवाज़ उठ्ठेगी
सदाए-बैकस-ओ-मजबूर ऐसा रंग लाएगी
हक़ीक़त है,ज़माने की रविश कुछ ऐसे बदलेगी
" "क़मर" इक दिन बुलंदी पस्तियों के पाँव चूमेगी
कि यूँ भी इन्क़िलाब-ए-नज़्म-ए- दुनिया हम ने देखा है"

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 11:32pm
जनाब श्री सुनील जी आदाब,जब तक आप जैसे हौनहार लोग इस विधा पर तबअ आज़माई नहीं करेंगे यह ज़िंदा तो रहेगी लेकिन सिसक सिसक कर ,मैं चाहता हूँ कि यह पूरी तरह ज़िंदा रहे,और इसे ज़िंदा रखने में मेरा साथ दें ।
सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 11:28pm
जनाब सौरभ पांडे जी आदाब,बहुत देर से आपका इन्तिज़ार था,लेकिन मैं आपकी मसरूफ़ियत से भी बख़ूबी वाक़िफ़ हूँ ,भाई आपकी यह मसरूफ़ियत कभी कभी हमें उसी तरह खलने लगती है जिस तरह भाभी जी को खलती होगी , हा हा हा...
आपने तज़मीन पढ़ ली,पसंद किया,मेरा लिखना सार्थक हुवा, अब इसके आगे की कड़ी तज़मीन बर तज़मीन कुछ देर बाद पोस्ट करने वाला हूँ ,उस पर भी एक नज़र डाल देंगे तो कृपा होगी ,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 11:19pm
मोहतरमा कल्पना जी आदाब,नया पन तो ओबीओ का ट्रेडमार्क है ,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 11:14pm
मोहतरमा कांता रॉय जी आदाब,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 11:13pm
जनाब अशोक कुमार रक्ताले जी आदाब,विधा कोई भी हो,इब्तिदा में मुश्किल ही नज़र आती है लेकिन मश्क़-ए-सुख़न के बाद रवानी आ जाती है,अब देखिये न ,दोहे,कुंडलियाँ,सारछन्द पर आपकी पकड़ इतनी मज़बूत है कि आप चलते फिरते बड़ी आसानी के साथ कह लेते हैं लेकिन जिस समय आपने पहला छन्द लिखा होगा उस समय ऐसी ही दुश्वारी पेश आई होगी ,अभ्यास बहुत ज़रूरी है मेरे भाई,अभ्यास करते रहें , सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 11:06pm
जनाब रवि शुक्ल जी आदाब,एक लेख क्या मैं पूरी किताब लिख देता ,मगर क्या करूँ मजबूर हूँ,जितना ज़रूरी था उतना लिख दिया है,इस विधा पर तबअ आज़माई ज़रूर करें ,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 11:01pm
जनाब बैजनाथ शर्मा 'मिंटू' जी आदाब,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 10:59pm
जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 10:58pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 2, 2016 at 10:56pm
जनाब निलेश "नूर" जी आदाब, याद दहानी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।

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