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कितनी ज़्यादा ख़ुशी पे पाबंदी (ग़ज़ल)

2122 1212 22

क्या लगी मैक़शी पे पाबंदी
यूँ लगे, ज़िन्दगी पे पाबंदी

जो लगा दे तो मर ही जाऊँ मैं
गर कोई शाइरी पे पाबंदी

ग़म की सीमा रही नहीं कोई
कितनी ज़्यादा ख़ुशी पे पाबंदी

वो लगाते ज़ुबान पर ताला
और फिर ख़ामुशी पे पाबंदी

बम-पटाखों पे कोई रोक नहीं
आजकल छुरछुरी पे पाबंदी

खेल लो खेल ख़ूब क़ुदरत से
क्यूँ लगे त्रासदी पे पाबंदी

मेरे दुश्मन हैं इंतज़ार में "जय"
कब लगे दोस्ती पे पाबंदी
======================

(मौलिक व अप्रकाशित)
【मतला बिहार की शराबबंदी से प्रेरित है।】

Views: 807

Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on May 24, 2016 at 10:11pm
सुखननवाज़ी के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by बशर भारतीय on May 24, 2016 at 4:54pm
बहुत बढ़िया आदरणीय जयनित जी
Comment by जयनित कुमार मेहता on May 23, 2016 at 10:30pm
आदरणीय डॉ गोपाल जी व आदरणीय बृजेश जी, हृदय से धन्यवाद आपको।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 23, 2016 at 10:27pm
खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 19, 2016 at 9:42pm

बढ़िया है ,वाह !

Comment by जयनित कुमार मेहता on May 18, 2016 at 9:38pm
आदरणीय जान गोरखपुरी भाई जी,बहुत दिनों बाद आपकी उपस्थिति व आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से दोहरी ख़ुशी हुई।
बहुत-बहुत धन्यवाद आपको!
:-)
Comment by जयनित कुमार मेहता on May 18, 2016 at 9:36pm
आदरणीय डॉ साहब, आपकी उपस्थिति व प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ।
Comment by जयनित कुमार मेहता on May 18, 2016 at 9:33pm
आदरणीय समर कबीर जी, आपकी उपस्थिति मेरे लिए बहुत ही आनंददायक होती है। आपकी प्रतिक्रिया से आश्वस्त हुआ हूँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद आपको।
सादर!!
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 18, 2016 at 6:28pm
वो लगाते ज़ुबान पर ताला
और फिर ख़ामुशी पे पाबंदी

वाह्ह्ह् ,पाबन्दी जैसे रदीफ़ को बहुत खूब निभाया है भाई जयनित जी।मुबारकबाद कबूल करें।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 18, 2016 at 5:04pm

आदरणीय जय्नित जी बढ़िया ग़ज़ल हुई है ..हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

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