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2122 2122 212
डूबता हूँ रोज़ मैं तिनके लिये
जिंदा हूँ यूँ जाने किस दिन के लिये

साँसें तो भरपूर दी अल्लाह ने
पर हिसाब इनके भी गिन-गिन के लिये

ज़िन्दगी से रोज़ पल चुनता रहा
पर नहीं दो पल भी जामिन के लिये

ये ख़याल आये न मुझको आख़िरश
उम्र भर मरता रहा किनके लिये

हाल तक वो पूछने आये नहीं
इक तरफ़ रख दी क़लम जिनके लिये

-मौलिक, अप्रकाशित

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Comment by Rahila on May 16, 2016 at 9:31am
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल आद. सर जी! बहुत बधाई ।सादर
Comment by जयनित कुमार मेहता on May 14, 2016 at 2:46pm
आदरणीय शिज्जु जी, बहुत खूबसूरत भाव पिरोये हैं आपने इस ग़ज़ल में। हार्दिक बधाई!!
Comment by रामबली गुप्ता on May 13, 2016 at 4:23pm
बहुत ही शानदार प्रस्तुति दिल खुश हो गया। दिली दाद कुबूल फरमाएं आदरणीय
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 13, 2016 at 7:47am

वाह शिज्जू भाई ..लेकिन तरही को अभी क्यूँ पोस्ट कर दिया ??

Comment by amita tiwari on May 13, 2016 at 1:01am

डूबता हूँ रोज़ मैं तिनके लिये

नया प्रयोग लगता है  सुंदर  और  रोचक 

बधाई 

Comment by Anuj on May 12, 2016 at 3:25pm

हाल तक वो पूछने आये नहीं
इक तरफ़ रख दी क़लम जिनके लिये

आदरणीय शिज्जू साहब.

बहुत मुश्किल ज़मीन तोड़ी है आपने. इस ज़मीन में ऐसे शेर कहना आसान नहीं है. 

Comment by Sushil Sarna on May 12, 2016 at 2:11pm


हाल तक वो पूछने आये नहीं
इक तरफ़ रख दी क़लम जिनके लिये

गज़ब के अहसास होते हैं आपकी ग़ज़लों में। इस बेहतरीन अहसासों वाली ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय शिज्जू शकूर साहिब।

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