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2122 2122 212

काँपती घाटी बुलाती है किसे
वादियाँ चुप अब उठाती हैं किसे?1

उलफतें अब हो रहीं बेजार हैं
मुफ्त की माशूका'भाती है किसे?2

हो गयी कुर्सी सियासत की कला
देखिये फिर से लुभाती है किसे?3

शोर कितने कर रहे बेघर सभी
सोचते हैं फिर बसाती है किसे?4

हो भले अपना निशाँ अब एकला
चंचला इसको थमाती है किसे?5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2016 at 11:46am

आ0 भाई मनन जी बहुत सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाइ स्वीकारें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on February 14, 2016 at 5:48pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह  जी!बेहतरीन गज़ल!

उलफतें अब हो रहीं बेजार हैं
मुफ्त की माशूका'भाती है किसे?!

Comment by Manan Kumar singh on February 11, 2016 at 11:17pm
आदर योग्य समर जी,शयाम नारायण जी व मिथिलेश जी आभ।र आपका।समर जी, आपकी सलाह मान्य है,शुक्रगुजार हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 11, 2016 at 7:25pm

आदरणीय मनन जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने.... हार्दिक बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on February 11, 2016 at 4:10pm
बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल ....हार्दिक बधाई ! 
Comment by Samar kabeer on February 11, 2016 at 10:38am
जनाब मनन कुमार जी आदाब,ग़ज़ल खूब है बधाई स्वीकार करें !
तीसरे शैर के सानी मिसरे में"देखते"की जगह"देखिये"करना उचित होगा |

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